Monday, September 4, 2017

जालौन जनपद और आजाद हिन्द फ़ौज

देवेन्द्र सिंह - लेखक 
जनपद जालौन में रह रहे आजाद हिन्द फ़ौज के कुछ सैनिकों के बारे में जो कुछ मालुम हो सका था वह आपसे साझा कर रहा हूँ. वैसे यह मेरा विषय नहीं है क्योंकि मैंने अपने शोध को १८५७-५८ की क्रान्ति तक ही रखा है. इसके बाद मेरे मित्र डा राजेन्द्र पुरवार का आग्रह हुआ कि १८५७ के बाद के जालौन के इतिहास के बारे में लिखो. मैंने हाथ खड़े कर दिए कि आगे का वह लिखें और मै साथ-साथ रहूँगा. तब उन्होंने बुंदेलखंड की राजनैतिक प्रयोगशाला - जनपद जालौन शीर्षक से एक पुस्तक लिखी. इस पुस्तक में जिले में रह रहे आजाद हिन्द फ़ौज के लोगों के बारे में खोजबीन करके उनका इंटरव्यू लेकर जानकारी प्राप्त करके एक अध्याय राजेन्द्र जी ने लिखा था. इंटरव्यू में मै भी साथ रहता था. अब जो मालूम हुआ वह आपके सामने रख रहा हूँ.
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आजाद हिन्द फ़ौज में इस जिले के उरई के दिग्विजय सिंह यादव, कोटरा के छोटे खां, दौलतपुरा के नजर अली, कुरसेंड़ा के रघुवीर सिंह व टीहर के फतेह बहादुर के नाम मिलते हैं. जब हम लोगों ने इंटरव्यू लिया उस समय दिग्विजय सिंह अजनारी रोड पर रह रहे थे. काफी बुढ्ढे हो गए थे और अस्वस्थ भी थे, इस कारण उनका इंटरव्यू कई बार में पूरा हुआ. दिग्विजय सिंह उरई के डी.ए.वी. से आठवी पास करने के बाद १९३९ में अंग्रेजी सेना में झाँसी में भर्ती हुए. ४ मार्च को मेडिकल कोर में सेवा हेतु चयनित हो कर कलकत्ता से सिंगापुर पहुंचे. वे लगभग ६ वर्ष वहाँ रहे और दो बार आत्म-समर्पण के साक्षी बने थे. उनकी याददाश्त बड़ी अच्छी थी और जो उन्होंने बतलाया उसका सार इस प्रकार है.

जापनी हवाई हमले से ध्वस्त उनके शिविर के हजारों भारतीय सैनिकों ने १५-२-१९४२ को जापान के कर्नल हिकाई के समक्ष आत्मसमर्पण किया था. पहले रास बिहारी बोस और एन.एस.गिल के कहने से आजाद हिन्द फ़ौज में शामिल हो युद्ध में रहे. बाद में १९४३ की जुलाई में नेताजी द्वारा आजाद हिन्द फ़ौज की दूसरी बार विधिवत स्थापना की गई. उनके आह्वान पर जालौन जिले के अन्य पांच साथियों के साथ नेहरु और गाँधी ब्रिगेड में शामिल होकर मलाया और सिंगापुर के युद्ध में भाग लिया. क्वालालाम्पुर में एक बार फिर १५-८-१९४५ को जापानी आत्मसमर्पण व नेताजी की तथाकथित दुर्घटना के बाद अंग्रेज सेना के समक्ष समर्पण किया. बाद में गढवाल राइफल के संरक्षण में लखनऊ लाया गया. यादवजी ने बतलाया कि यहाँ पर हुलकारे कूकुर की भांति मुकदमा चलाया गया. अब यह हुल्कारे कूकुर वाली बात समझ में नहीं आई. तब उन्होंने जो बताया उससे उनके मन की पीड़ा समझ में आई. उन्होंने कहा कि सड़क का जो कुत्ता (कूकुर) होता है उसको कोई नहीं पूछता है. वह जहाँ भी जाता है उसको दुत्कारा जाता है. हुलकारे जाने का अर्थ दुत्कारने से बुंदेलखंड में लिया जाता है. यही हाल हम लोगों का था क्योंकि अभी हम अंग्रेजो के गुलाम थे और उनकी फ़ौज के विरुद्ध लडे थे हमारी इज्जत वो क्यों करते.

यादव जी ने और भी कई बाते साझा कीं.  उनके अनुसार फ़ौज का उदेश्य वाक्य एकता, विश्वास व बलिदान  तथा प्रतीक चिन्ह छलांग लगाता चीता था. फ़ौज का युद्धघोष नारा दिल्ली चलोजय हिन्द था.  फ़ौज का प्रयाण गीत कदम कदम बढाए जा, ख़ुशी के गीत आए जा था, जिसे कर्नल राम सिंह ने संगीतबद्ध किया था. उन्होंने बताया कि अंततोगत्वा २४ जनवरी १८४६ को मुक्त घोषणा के बाद उरई वापस आए. जहाँ उनका वीर योद्धा की भांति स्वागत गाँव और नगर में किया गया. आजाद हिन्द फ़ौज के इस जनपदीय सेनानी दिग्विजय सिंह ने २००६ में अंतिम साँस ली.

अपने जीवनकाल की सांध्य बेला डिकौली में बिता रहे मलखान सिंह ने भी अपनी यादें साझा करते हुए बतलाया कि वे भी मेडिकल यूनिट में सिपाही न० ९२६०४८ के रूप में भर्ती हुए थे. कानपुर, अहमदाबाद और बम्बई में प्रशिक्षण प्राप्त कर दक्षिण पूर्वी एशिया के कई देशों में रहे. इनको भी अंग्रेजी सेना की पराजय के बाद जापनी सेना को सौप दिया गया था. बाद में नेता जी ने आई.एन.ए.में शामिल कर लिया. बाद की कहानी वही है जो दिग्विजय सिंह की थी. मलखान सिंह का दुःख यह है कि आजाद होने के बाद शासन की उपेक्षा के चलते उन्हें शीघ्र ही बिसार दिया गया.


नेता जी द्वारा नेहरु, गाँधी, आजाद के नाम पर ब्रिगेड को बनाना क्या आपको कुछ सोचने के लिए विवश नहीं करता? यदि करता है तो धन्यवाद. जिले में आजाद हिन्द फ़ौज की इतनी ही जानकारी ही मेरे पास है. यदि किसी का नाम या कोई जानकारी छूट गई हो तो मैं पहले से ही माफ़ी मांगे लेता हूँ.  

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© देवेन्द्र सिंह  (लेखक)

कॉपीराईट चेतावनी - बिना देवेन्द्र सिंह जी की अनुमति के किसी भी लेख का आंशिक अथवा पुर्णतः प्रकाशन कॉपीराइट का उल्लंघन माना जायेगा. ऐसा करने वाले के विरुद्ध कानूनी कार्यवाही की जा सकती है. जिसके लिए वह व्यक्ति स्वयं जिम्मेवार होगा.

Sunday, August 20, 2017

बाँदा के नवाब अलीबहादुर और अजयगढ़ राज - भाग २


देवेन्द्र सिंह - लेखक 


आरा (बिहार) की पलटन के बाँदा आने और उनका सहयोग मिलने से बाँदा के नवाब को बड़ी राहत महसूस हुई। अब उसको अजयगढ़ वालों से इतना डर नही रहा जितना पहले था। बिहार से ही एक और सैन्य दल इस ओर चला था। इन सैनिकों ने नागौद में क्रांतिकारियों की मदद करके वहां क्रांति करवा दी थी। यह सैन्य दल भी बाँदा आ गया। नवाब ने इनकी भी बड़ी आवभगत की। इनका नायक सूबेदार शिव दयाल था। कुछ समय बाद ही बाबु कुँवरसिंह भी रीवा के रस्ते बाँदा आ गए। रीवा राज ने इनको अपने यहाँ नही रुकने दिया था। इन सब सैन्य दलों के बाँदा आने के पहले अजयगढ़ के रणजोर दौऊआ ने बाँदा के एक साहूकार के लडके का अपहरण करवा लिया था और अपने कैद में रखे था। नवाब के बार-बार अनुरोध करने पर भी उसने लडके को मुक्त नही किया वह फिरौती की रकम मांग रहा था। नवाब अपने सैन्य दल के बूते दउआ से लड़कर उसको मुक्त करने की हिम्मत नही कर पा रहा था और फिरौती की रकम देकर छुडवाने में नवाब की भारी बेज्जती होती। अब नवाब को एक मौका मिला। उसने सूबेदार शिव दयाल से रणजोर पर आक्रमण करने में सहायता देने को कहा। सूबेदार शिव दयाल ने दउआ पर आक्रमण करने का भय दिखाया इस पर दउआ ने साहूकार के पुत्र को छोड़ दिया। लेकिन रनजोर सिंह दउआ के तो बुरे दिन शुरू हो गए थे।

९ अक्तूबर १८५७ को दउआ की जंगपुर चौकी के कुछ सिपाहियों की बाँदा में रुके सैनिकों से कहासुनी हो गई और अजयगढ़ के सिपाहियों ने इन सैनिकों पर गोलीबारी कर दी। बाँदा के सैनिकों को इस तरह की किसी बात की उम्मीद नही थी। अचानक हुई इस गोलीबारी की घटना में बाँदा के १५-१६ सैनिक मारे गए। बाँदा के सैनिकों ने इसका बदला लेने के लिए दउआ पर आक्रमण कर दिया। कुंअरसिंह ने भी इस युद्ध में भाग लिया मगर उन्होंने सेना का नेतृत्व अलीबहादुर को करने दिया। दो दिन चली इस लड़ाई में अंत में दउआ की पराजय हुई। दउआ ने सफ़ेद झंडा फहरा कर हार स्वीकार की और अजयगढ़ जाने के लिए मार्ग देने की बात कही। अलीबहादुर तो दउआ से बहुत ही नाराज था अतः उसने मांग नही मानी। लड़ाई चलती रही। चौथे दिन के युद्ध में सूबेदार भवानी सिंह और महताब अली ने दउआ को पकड़ ही लिया। उसके साथ अजयगढ़ के तीन अन्य सैनिक अधिकारी भी पकड़े गये। इन सबको कैद करके बाँदा लाया गया और नवाब अलीबहादुर के सामने पेश किया गया। कहा तो यह जाता है की अजयगढ़ के इन लोगों के सिर काट कर खटोआ दीवाल पर लटका दिया गया था। इस लड़ाई में बहुत से क्रन्तिकारी सैनिक तथा लगभग ३०० सिपाही मारे गए थे।


इस युद्ध में नवाब द्वरा भर्ती किए गए सैनिकों, बाँदा में रुके हुए अंग्रेजी फ़ौज के विद्रोही सैनिकों और आरा तथा दानापुर बिहार से आए सनिकों ने भाग लिया था। रणजोर दउआ को जब नवाब के सामने पेश किया गया तो बाँदा के विद्रोही सैनिकों ने नवाब से दउआ के बदले में तीन लाख रु० की मांग की। अलीबहादुर ने इसमें असमर्थता जताई। इस पर इन सैनिकों ने गौरिहार के जागीरदार से कहा कि वे दउआ को ले लें और बदले में इनाम के तौर पर दो लाख रु० दें। इस पर गौरिहार के जमिदाए ने कहा कि वे नवाब अलीबहादुर को पकड़ लावें और अंग्रेजों के हवाले कर दें तो वह उनको पांच लाख रु० देंगे। इस पर ये सैनिक बहुत नाराज हो गए और उन्होंने मौका देख कर एक दिन गौरिहार जमीदार का बाँदा स्थित महल को लुट लिया। महल की बहुमूल्य वस्तुए,रुपए, कीमती फर्नीचर आदि जला डाला। दउआ को नवाब को सौंप दिया। अब उन्होंने नवाब से कहा कि वे चालीस हजार रु० ही दे दें। नवाब जब चालीस हजार पर भी तैयार नही हुए तो उन्होंने कहा कि दउआ को उनको लौटा दिया जाय और जो दो तोपे निम्नीपार की लड़ाई में अजयगढ़ वालो की छिनी गईं है वे भी उनको दीं जाय यदि यह बात नही मानी जाती है तो वे नवाब के महल और बाँदा को लुट लेंगे। मगर नवाब को कुँवरसिंह और उनकी फ़ौज का सहारा था अतः उसने एक भी बात नही मानी। बात कुछ और बढती इसके पहले ही नवाब ने बवाल की जड़ को ही काट देना ठीक समझा। अलीबहादुर के इशारे पर उनके समर्थक इमामबख्श ने दउआ को फांसी पर चढ़ा कर इस किससे को ही खत्म कर दिया। रणजोर दउआ का आतंक समाप्त होने पर नवाब ने चैन की साँस ली। फौजियों ने दोनों तोपें अपने अधिकार में ले लीं। 

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© देवेन्द्र सिंह  (लेखक)

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Wednesday, August 9, 2017

शौर्य बलिदान की गाथा कहता लोकपर्व कजली

बुन्देलखण्ड क्षेत्र में आज भी भुन्जरियों का पावन पर्व कजली पूरे उत्साह और श्रद्धा से मनाया जाता है. विन्ध्य पर्वत श्रेणियों में बसा, सुरम्य सरोवरों से रचा, नैसर्गिक सुन्दरता से निखरा बुन्देलखण्ड क्षेत्र सदैव से अपनी ऐतिहासिकता, संस्कृति, लोक-तत्त्व, शौर्य-ओज, आन-बान-शान की अद्भुत छटा के लिए प्रसिद्द रहा है. यहाँ की लोक-परम्परा में शौर्य-त्याग-समर्पण-वीरता के प्रतीक मने जाने वाले कजली का विशेष महत्त्व है. इस क्षेत्र के परम वीर भाइयों, आल्हा-ऊदल के शौर्य-पराक्रम के साथ-साथ अन्य बुन्देली रण-बाँकुरों की विजय-स्मृतियों को अपने आपमें संजोये हुए कजली मेले का आयोजन आठ सौ से अधिक वर्षों से निरंतर होता आ रहा है. किसी समय में बुन्देलखण्ड में कजली को खेती-किसानी से सम्बद्ध करके देखा जाता था. ग्रीष्म की लू-लपट से अपने आपको झुलसा देने वाली गरमी से गर्म-तप्त खेतों को जब सावन की फुहारों से ठंडक मिलती थी तो यहाँ का किसान अपने आपको खेती के लिए तैयार करने लगता था. सावन महीने की नौवीं से ही इसका अनुष्ठान शुरू हो जाता था. घर-परिवार की महिलाएँ खेतों से मिट्टी लाकर उसे छौले के दोने (पत्तों का बना पात्र) में भरकर उसमें गेंहू, जौ आदि को बो देती थी. नित्य उसमें पानी-दूध को चढ़ाकर उसका पूजन किया जाता था, इसके पीछे उन्नत कृषि, उन्नत उपज होने की कामना छिपी रहती थी. सावन की पूर्णिमा को इन पात्रों (दोने) में बोये गए बीजों के नन्हें अंकुरण (कजली) को निकालकर दोनों को तालाब में विसर्जन किया जाता था. बाद में इन्हीं कजलियों का आपस में आदरपूर्वक आदान-प्रदान करके एक दूसरे को शुभकामनायें देते हुए उन्नत उपज की कामना भी की जाती थी. ये परम्परा आज भी चली आ रही है, बस इसमें शौर्य-गाथा के जुड़ जाने से आज इसका विशेष महत्त्व हो गया है.

बुन्देलखण्ड के महोबा राज्य पर पृथ्वीराज चौहान की नजर बहुत पहले से लगी हुई थी. महोबा राज्य के विरुद्ध साजिश रचकर कुछ साजिशकर्ताओं ने वहां के अद्भुत वीर भाइयों, आल्हा-ऊदल को महोबा राज्य से निकलवा दिया था. पृथ्वीराज चौहान को भली-भांति ज्ञात था कि महोबा के पराक्रमी आल्हा और ऊदल की कमी में महोबा को जीतना जीतना आसान होगा. महोबा के राजा परमाल की पुत्री चंद्रावलि अपनी हजारों सहेलियों और महोबा की अन्य दूसरी महिलाओं के साथ प्रतिवर्ष कीरत सागर तालाब में कजलियों का विसर्जन करने जाया करती थी. सन 1182 में दिल्ली के राजा पृथ्वीराज चौहान ने राजकुमारी के अपहरण की योजना बनाई और तय किया गया कि कजलियों के विसर्जन के समय ही आक्रमण करके राजकुमारी का अपहरण कर लिया जाये. अपनी विजय को सुनिश्चित करने और राजकुमारी के अपहरण के लिए उसके सेनापति चामुंडा राय और पृथ्वीराज चौहान के पुत्र सूरज सिंह ने महोबा को घेर लिया. जिस समय ये घेरेबंदी हुई उस समय आल्हा-ऊदल कन्नौज में थे.

महोबा राजा सहित सबको इसका एहसास था कि बिना आल्हा-ऊदल पृथ्वीराज चौहान की सेना को हरा पाना मुश्किल होगा. राजा परमाल खुद ही आल्हा-ऊदल को राज्य छोड़ने का आदेश दे चुके थे, ऐसे में उनके लिए कुछ कहने-सुनने की स्थिति थी ही नहीं. ऐसे विषम समय में महोबा की रानी मल्हना ने आल्हा-ऊदल को महोबा की रक्षा करने के लिए तुरंत वापस आने का सन्देश भिजवाया. सूचना मिलते ही आल्हा-ऊदल अपने चचेरे भाई मलखान के साथ महोबा पहुँच गए. परमाल के पुत्र रंजीत के नेतृत्व में पृथ्वीराज की सेना पर आक्रमण कर दिया गया. इस युद्ध की सूचना मिलते ही राजकुमारी चंद्रावलि का ममेरा भाई अभई (रानी मल्हना के भाई माहिल का पुत्र) उरई से अपने बहादुर साथियों के साथ महोबा पहुँच गया.

लगभग 24 घंटे चले इस भीषण युद्ध में आल्हा-ऊदल के अद्भुत पराक्रम, वीर अभई के शौर्य के चलते पृथ्वीराज चौहान की सेना को पराजय का मुंह देखना पड़ा. सेना रणभूमि से भाग गई. इस युद्ध में पृथ्वीराज चौहान का पुत्र सूरज सिंह भी मारा गया. इसके अलावा राजा परमाल का पुत्र रंजीत सिंह और वीर अभई भी वीरगति को प्राप्त हुए. ऐसी किंवदंती है कि वीर अभई सिर कटने के बाद भी कई घंटों युद्ध लड़ता रहा था. कहा जाता है कि इसी युद्ध में पृथ्वीराज चौहान ने ऊदल की हत्या छलपूर्वक कर दी थी. जिसके बाद आल्हा ने पृथ्वीराज चौहान को मारने की शपथ ली किन्तु बाद में अपने गुरु की आज्ञा मानकर संन्यास ग्रहण कर जंगल में तपस्या के लिए चले गए थे.


ऐतिहासिक विजय को प्राप्त करने के बाद राजकुमारी चंद्रावलि और उसकी सहेलियों के साथ-साथ राजा परमाल की पत्नी रानी मल्हना ने, महोबा की अन्य महिलाओं ने भी भुजरियों (कजली) का विसर्जन किया. इसी के बाद पूरे महोबा में रक्षाबंधन का पर्व धूमधाम से मनाया गया. तब से ऐसी परम्परा चली आ रही है कि बुन्देलखण्ड में रक्षाबंधन का पर्व भुजरियों का विसर्जन करने के बाद ही मनाया जाता है. वीर बुंदेलों के शौर्य को याद रखने के लिए ही कहीं-कहीं सात दिनों तक कजली का मेला आयोजित किया जाता है. यहाँ के लोग आल्हा-ऊदल के शौर्य-पराक्रम को नमन करते हुए बुन्देलखण्ड के वीर रण-बाँकुरों को याद करते हैं.