04/11/2018

बौद्धिक ज्ञान प्रतियोगिता 2018 का अंतिम परिणाम

डॉ० दिनेश चन्द्र द्विवेदी जी की स्मृति में आयोजित बौद्धिक ज्ञान प्रतियोगिता 2018 का अंतिम परिणाम यहाँ घोषित किया जा रहा है. 
विजयी प्रतिभागियों को शुभकामनायें.... 

पुरस्कार वितरण 15 नवम्बर 2018 को पूर्वाह्न 11 बजे से रसकेंद्री देवी महाविद्यालय, ऊमरी (जालौन) में संपन्न होगा. 

सभी प्रतिभागी समय का विशेष ध्यान रखें.



08/10/2018

बौद्धिक ज्ञान प्रतियोगिता 2018 के सही उत्तर

डॉ० दिनेश चन्द्र द्विवेदी जी की स्मृति में दिनांक 07 अक्टूबर 2018 को आयोजित बौद्धिक ज्ञान प्रतियोगिता 2018 के सही उत्तर 
प्रतिभागी अपने उत्तरों की जाँच इसके माध्यम से कर सकते हैं.



25/05/2018

बुंदेली धरा और ओरछा फ़िल्म महोत्सव IFFO 2018


बुंदेली धरा और फ़िल्म महोत्सव IFFO 2018
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पाँच दिवसीय भारतीय फिल्म महोत्सव 2018 के महापर्व ने बुन्देलखण्ड की धरती पर जो अलख जगाई है वह अपने आप में ऐतिहासिक छाप छोड़ती है। प्रयास प्रोडक्शन के सौजन्य से यह आयोजन रुद्राणी बुंदेली कलाग्राम ओरछा की पावन धरा पर संपन्न हुआ। पावन भूमि पर पावन नक्षत्र पुष्य में इस आयोजन की रूपरेखा की नींव रखी बुन्देलखण्ड के साहसिक व्यक्तित्व राजा बुंदेला ने, जो आज किसी परिचय अथवा विशेषण के मोहताज़ नहीं हैं। उनके कदम से कदम मिलाकर इस महोत्सव को सफल बनाने का दायित्व लिया रंगमंच और सिनेजगत की सशक्त अदाकारा सुष्मिता मुख़र्जी और उनके सहयोगी बॉलीवुड के निर्देशक राम बुंदेला ने।
भारतीय सिनेजगत की हस्तियाँ महोत्सव में न केवल शामिल हुईं वरन सम्मानित भी हुईं। लोकांचल का महापर्व सिनेमाई रंगीनियों से पाँचों दिन रंगारंग रहा। अभिनेत्री रोहिणी हट्टंगड़ी भारत गौरव सम्मान से, नफीसा अली राय प्रवीण सम्मान से, यशपाल शर्मा राजा गंगाधर राव सम्मान से, निर्देशक केतन आनन्द और रजित कपूर अभिनेता ए०एन० अंसारी सम्मान से अलंकृत हुए।  बॉलीवुड के लीजेंड्री निर्देशक मनोहर खुशलानी भी इस महोत्सव का हिस्सा बन सम्मानित हुए।

ओरछा रामराजा मंदिर से आशीर्वाद लेकर शुभारम्भ 

महोत्सव का श्रीगणेश लोक कवि ईसुरी सम्मान से सम्मानित राज्यमंत्री उ०प्र० शासन  माननीय हरगोविंद कुशवाहा ने किया और उन्हीं के उद्बोधन से महोत्सव का समापन हुआ। इस महापर्व में भारत सरकार केंद्रीय राज्य मंत्री माननीय डॉ० वीरेंद्र कुमार, महिला एवं बाल विकास राज्यमंत्री भारत सरकार माननीय ललिता यादव, श्री मानवेंद्र सिंह जिलाधिकारी ललितपुर, श्री अभिजीत अग्रवाल कलेक्टर टीकमगढ, श्री प्रेम सिंह चौहान एसडीएम निवाड़ी, श्री दिनेश तिवारी सीएमओ ओरछा, भाजपा जिलाध्यक्ष श्री अभय प्रताप सिंह, पूर्व विधायक श्री बृजेन्द्र सिंह राठौर ने अपनी गौरवशाली उपस्थिति देकर आम जनता के साथ दर्शकदीर्घा में  चलचित्रों, नाटकों और बुंदेली लोककलाओं के आनंद को साझा किया।


रुद्राणी बुंदेली कलाग्राम के इस आयोजन ने हर क्षेत्र के चयनित प्रतिनिधियों का सम्मान किया। रामलीला को अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर नाम देने वाले उरई के श्री अयोध्या प्रसाद गुप्त 'कुमुद' को बाबू वृंदावन लाल वर्मा सम्मान प्रदान किया गया। झाँसी के श्री विवेक मिश्र को मुंशी प्रेमचंद सम्मान प्रदान करने के साथ उनकी पुस्तक डॉमनिक की वापसी लोकार्पित हुई। ज्ञातव्य हो कि उनकी कहानी हनिया पर राजा बुंदेला फ़िल्म निर्माण कर रहे हैं। प्रख्यात उपन्यासकार महेंद्र भीष्म की एक अप्रेषित पत्र (चतुर्थ संस्करण) लोकार्पित होने के साथ उनको मैथिली शरण गुप्त सम्मान प्रदान किया। इसी अवसर पर उनकी अध्यक्षता में उनके नाटक तीसरा कम्बल की समर्पयामि टीकमगढ समूह (निर्देशक गीतिका वेदिका) ने विश्वपटल पर इक्कीसवीं प्रस्तुति दी। मुम्बई के अज़ीम शाइर श्री रमीज़ दत्त को गीतकार इंदीवर सम्मान प्रदान कर उनकी मकबूल शायरी का रसास्वादन किया। इसी क्रम में बुन्देलखण्ड की नामचीन हस्तियाँ भी सम्मानित हुईं।

सम्मान महेन्द्र भीष्म 

इसी श्रंखला में समाजसेवियों को भी सम्मानित किया गया। सोनी तालबेहट नगर पंचायत अध्यक्ष सुश्री मुक्ता सोनी झलकारीबाई सम्मान से, समाजसेवी सुश्री अर्चना गुप्ता वीरांगना अवंतिबाई सम्मान से, अर्जुन अवॉर्डी ओलंपियन हॉकी श्री अशोक ध्यानचंद, श्री आलोक सोनी कवि जगनिक सम्मान से, श्री आर०पी०निरंजन (प्रतिनिधि विधायक परिषद उ०प्र०) ए०पी०जे० अब्दुल क़लाम सम्मान से विभूषित हुए।

निर्देशक मनोहर कौशलानी और सुष्मिता मुखर्जी संग संयोजिका गीतिका वेदिका 

इसके साथ-साथ अन्य क्षेत्रों में योगदान देने वाले प्रतिनिधि भी सम्मानित हुए। जिनमें संतराम, पवन शर्मा, रीमा जी, पत्रकार कुमारेन्द्र सिंह सेंगर, अहिवरन सिंह, उमेश यादव, पं० विपिन बिहारी महाराज चित्रकूट, अजीत सिंह, डॉ० आर०आर० सिंह, प्रकाश गुप्त एवं झाँसी सदर बाज़ार से नारायण चाट भंडार प्रमुख रहे।

विशेष तथ्य-
बुंदेली परम्परा के अनुसार चारपाई व मचान वाली शयन व्यवस्था
पीने के लिए मिट्टी के घड़ों का शीतल जल
रुद्राणी बुंदेली कलाग्राम मुक्ताकाशी मंच की बुंदेली घरगूला सी पार्श्वसज्ज़ा
बुंदेली परिवेश के रंगों से सुसज्जित कई चित्रकारों की चित्रकला वीथिका


टपरा टॉकीज अवधारणा
इंडियन फ़िल्म फेस्टिवल ओरछा 2018 की आधारशिला टपरा टॉकीज की अवधारणा थी। टपरा टॉकीज का विलुप्तीकरण होना चिन्ताजन्य विषय है। जिससे आमजन की फ़िल्म से दूरी बन जाती है। यही उद्देश्य लेकर दो टपरा टॉकीज की स्थापना की गई। जिनमें  टपरा टॉकीज - एक में बॉलीवुड की चुनिंदा फीचर फिल्मों के शो चले और टपरा टॉकीज - दो में बुन्देलखण्ड के निर्माता/निर्देशक/ अभिनेताओं की फिल्में, लघुफिल्म और वृतचित्र आदि शामिल रहे। उन फिल्मों के निर्देशकों को सम्मानित कर उनकी फिल्मों को मंच दिया गया।

रुद्राणी कलाग्राम का विहंगम दृश्य - टपरा टॉकीज 

महोत्सव दैनन्दिनी
महोत्सव का प्रारम्भ भोर की बेला से होने लगता था। योगगुरु इंद्रजीत योगी की योग्याभ्यास की कक्षाएं तन-मन को स्फूर्तिदायक बनाने में उपयोगी सिद्ध हुईं। तत्पश्चात स्नानध्यान के बाद बुंदेली संस्कृति में कलेवा होना और दोपहर मुम्बई से आये हुए निर्देशक/अभिनेता विद्वान मनोहर खुशलानी, केतन आनन्द, नफीसा अली, रोहिणी हट्टंगड़ी अपना अभिनय/ निर्देशन/ तकनीकी ज्ञान को आयोजित कार्यशालाओं में भावी निर्देशक/ अभिनेता से साझा कर उन्हें आगामी फिल्मों के लिए तैयार किया, जो बुन्देखण्ड विश्वविद्यालय के कलावर्ग के छात्र थे। इसके पश्चात के समय टपरा टॉकीज में चयनित सामयिक/सामाजिक फिल्मों के निःशुल्क शो चलते थे, जिन्हें जनता बड़े ही उत्साह से देखती थी। साँझ की जुन्हाई से देर रात्रि तक सांस्कृतिक-रंगारंग प्रस्तुतियाँ मन को मोहने वाली होती थीं। गीतिका वेदिकाआरिफ़ शाहडोली द्वयमंचसंचालन में नाटक हरदौल, चट्टान, तीसरा कम्बल, सैयाँ भये कोतवाल, ढ़ड़कोला, दस्तक के साथ बुंदेली परम्परा की राई, बधाई, लमटेरे, सुअटा, फागें, दीवारी, बृज की होरी, सोहरे के मुम्बई की प्रस्तुतियों के संगम रहे। विशेष रूप से जयकरण निर्मोही की प्रस्तुति बुन्देलखण्ड राज चाहिये दर्शकों का मन मोह ले गयी।

सांस्कृतिक कार्यक्रम 

भारतीय फिल्म समारोह (IFFO) के आयोजन से क्षेत्रीय लोगों को रोज़गार मिलना, रामराजा सरकार की पावन भूमि ओरछा का विश्वविरासत के समकक्ष नाम होना, पर्यटन को बढ़ावा मिलना, बुंदेली लोककलाओं का संरक्षण व संवर्धन एवं मुख्य उद्देश्य टपरा टॉकीज को पुनर्जीवन देना था। इफ़ो का सेट निर्माण भारतीय सिनेमा के मशहूर कलानिर्देशक श्री जयंतदेशमुख ने किया।

नाटक तीसरा कम्बल का भावपूर्ण दृश्य 

प्रयास प्रोडक्शन के राजा बुंदेला द्वारा प्रतिकूल परिस्थितियों में उठाये गये साहसिक कदम का सफलतापूर्वक समापन हुआ। पैंतालीस डिग्री तापमान पर भी उत्साह कम नहीं हुआ। दूर क्षेत्रों से जनता पधारी और उत्साह से आयोजन में शामिल हुई। इस महाआयोजन का धार्मिक दृष्टिकोण से भी महत्व रहा। मन तब भावातिरेक से भर उठा जब मध्यप्रदेश की गंगा माँ बेत्रवती की आरती गंगामैया की तर्ज़ पर की गई। जगमग आरती के उच्च स्वरों के साथ घड़ियाल और झांझर घनघना उठे और समस्त जन ने कवि/अभिनेता आरिफ़ शहडोली रचित व संगीतकार जयकरण निर्मोही संगीतबद्ध आरती को सामूहिक रूप से गाकर अपनी आस्था प्रकट की।

माँ बेत्रवती की आरती 

इफ़ो की मुख्य कार्यकारिणी समिति सदस्यों में जगमोहन जोशी, आरिफ़ शहडोली, गीतिका वेदिका, राकेश विश्वकर्मा, डॉ० नईम थे। इफ़ो को अपने अथक परिश्रम से सजाने वाले सदस्यों में मातादीन कुशवाह (रुद्राणी कलाग्राम), ओंकार, अरूण कांटे, अभय द्विवेदी, प्रवीण झा, मनीष दुबे, विराज तिवारी, ज़ावेद खान, दिनेश, नम्रता, साकेत,  तेजल, राजेश्वर राज व रोहित आदि का योगदान सराहनीय रहा।

18 मई से 22 मई तक चले इंडियन फ़िल्म फेस्टिवल ओरछा 2018 में जनताजनार्दन ने भागीदारी कर उत्तरोत्तर सफलता के आयाम स्थापित किये। आने वाले वर्ष में स्थापित रूप से यह महाआयोजन नए कीर्तिमान गढ़ेगा।

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गीतिका वेदिका
संयोजिका व उद्घोषिका भारतीय फिल्म महोत्सव ओरछा 2018
 (लेखिका साहित्यकार व अभिनेत्री हैं)
सम्पर्क - 9826079324


09/01/2018

खजुराहो अंतर्राष्ट्रीय फ़िल्म महोत्सव ने खोले संभावनाओं के द्वार

तृतीय खजुराहो अंतर्राष्ट्रीय फ़िल्म महोत्सव ने खोले संभावनाओं के द्वार
गीतिका वेदिका
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तृतीय खजुराहो अंतर्राष्ट्रीय फ़िल्म महोत्सव 2017 में बुंदेली संस्कृति की स्वर्णिम छाप और मुम्बईया प्रस्तुतियों का मिला-जुला प्रभाव जनता जनार्दन को चतुर्थ खजुराहो अंतर्राष्ट्रीय फ़िल्म महोत्सव की प्रतीक्षा दे गया है। तीसरे अंतर्राष्ट्रीय महाकुंभ को बुंदेली धरती पर अवतरित करने का सारा श्रेय राजा बुंदेला को जाता है। निर्देशकएक्टर और प्रयास प्रोडक्शन के प्रमुख राजा बुन्देला एक सर्वकालिक  व्यक्तित्व हैं जो किसी भी परिचय के मोहताज नहीं हैं। प्रयास प्रोडक्शन से मुझे चाँद चाहिएये शादी नहीं हो सकतीकोलगेट टॉप टेनराजपथओ मारिया इत्यादि उल्लेखनीय सीरियल रहे। राजा बुंदेला ने फ़िल्म इंडस्ट्री की कई मशहूर हस्तियों को उनके शुरुआती दौर में इंडस्ट्री से रूबरू करवाया जो आज इंडस्ट्री में अपनी पहचान रखते हैंइनमें प्रमुख हैं- इरफान खानसतीश कौशिकआर्ट डायरेक्टर जयंत देशमुख। वर्तमान में जयंत देशमुख हिंदी फ़िल्म जगत के मशहूर कलानिर्देशक हैं।


राजा बुंदेला जिनकाबुन्देलखण्ड की माटी से लगाव सर्वविदित है और वे राजनैतिक रूप से हाशिये पर डाल दिये गए बुंदेलखण्ड क्षेत्र को देश के मानचित्र पर उचित स्थान दिलाने के लिये सतत प्रयासरत रहे हैं। उन्होंने इसके लिये कई जनांदोलन चलाये। राजा बुंदेला इस महोत्सव की आधारशिलाइस विचार के जन्मदाता हैं उन्होंने इसे मूर्त रूप में साकार किया। अपने शुरुआती दौर में 2015 में यह महोत्सव तीन दिनी रहा जबकि वर्ष 2016 में यह पाँच दिनों तक मनाया गया। इसकी सफलता के आयाम इस वर्ष इसे सफलता के सात दिन दे गए। इन सात दिनों में देश दुनिया से आये हुए अंतरराष्ट्रीय ख्यातिप्राप्त कलाकारों ने शिरक़त की। जहाँ तमाम सिने-अभिनेता जनता के आकर्षण का केंद्र रहे तो वहीं दूसरी ओर बुंदेली संस्कृति को विश्वव्यापी मंच मिला। सिने जगत के प्रसिद्ध चेहरे जिन्होंने एक सदी तक फ़िल्म जगत पर राज कियाइस महोत्सव के विशेष आकर्षण के केंद्र रहे। बॉलीवुड के हीरो जैकी श्रॉफ ने एक पूरा दिन अपने रंग में रंग दिया तो खलनायक रंजीत कपूर के चहेते सम्वाद पापा कहने से दर्शकदीर्घा झूम उठी। सदी के स्थापित खलनायक प्रेम चोपड़ा ने जब अपना पसंदीदा डायलॉग प्रेम नाम है मेरा प्रेम चोपड़ा बोला तो सदन तालियों की गड़गड़ाहट से गूंज उठा।


फिल्मकार शेखर कपूर को भारत गौरव सम्मान प्रदान करने से इस महोत्सव का श्रीगणेश हुआ। जाने माने फ़िल्म निर्माता-निर्देशक रमेश सिप्पीगोविंद निहलानी की प्रेस कॉन्फ्रेंस में फ़िल्म निर्माण से सम्बंधित प्रश्नोत्तर काल रखा गया। महोत्सव प्रारम्भ होने के पूर्व दिन का फ़िल्म मेकिंग और रंगकर्म की कार्यशाला सिने जगत व रंगमंच के हस्ताक्षर सुप्रसिद्ध हस्ती सुष्मिता मुखर्जीमीता वशिष्ठ और मनोहर खुशलानी के संरक्षण में आयोजित की गईजिसमें मध्यप्रदेश के कई गाँव-शहर से साथ ही स्थानीय नवांकुर शामिल हुए। जिनमें से तीन नवोदित युवा अनुपम खैरसुभाष घईऔर रमेश सिप्पी की अकादमी में प्रशिक्षित होने को चयनित हुए। महोत्सव के मुख्य व्यवस्थापक की महती भूमिका में फ़िल्म डायरेक्टर राम बुंदेला एवं उनके सहयोगी ललितपुर से निकल के मुम्बई पहुंच के डारेक्शन में अपनी पहचान बनाने वाले राकेश साहू और जगमोहन जोशी (प्रोडक्शन मैनेज हिंदी फ़िल्म इंडस्ट्री) थे। मुख्य आमंत्रित सदस्य के रूप में बलविंदर राल (बिल्लू जी) थेजो तकरीबन तैतीस सालों से हिंदी सिनेमा जगत में बतौर फ़िल्म-सम्पादन (एडिटर) के रूप में स्थापित हैं।

इस सात दिवसीय तृतीय अंतर्राष्ट्रीय खजुराहो फ़िल्म फेस्टिवल 2017 के समापन समारोह का मुख्य आतिथ्य हरियाणा के राज्यपाल महामहिम कप्तान सिंह सोलंकी ने किया। इस फ़िल्म महोत्सव का विशेष आकर्षण खजुराहो में लगाई गईं पांच टपरा टॉकीज रहीं। जिन में दिन भर निःशुल्क फिल्में चलाई गईं जो किसानमहिलासैनिकबेटी पर आधारित थी। टपरा टॉकीज की परिकल्पना इस बात के मद्देनजर की गई क्योंकि क्षेत्र में फ़िल्म थियेटर नगण्य हैंजिनसे कई अच्छी फिल्मों की दर्शकों तक पहुंच नहीं हो पाती। इन टपरा टॉकीज में उन क्षेत्रीय फिल्मों को स्थान मिला जो कि कहीं भी प्रदर्शित नहीं हो पाती हैं। इसके साथ ही बुंदेली व्यंजन की भी व्यवस्था की गई जिसे दर्शक दीर्घा ने खूब सराहा।

राजा बुंदेला अपने प्रयास से बुंदेलखण्ड के उन गाँवकस्बों और शहरों की दहलीज तकजहां तक फिल्में पहुंचना भी मुश्किल थींवहाँ वे फ़िल्मक्षेत्र की मशहूर हस्तियों को ले आये। बुंदेलखण्डवासियों का इन हस्तियों से रूबरू होना एक विशाल उपलब्धि रही। इनमें उल्लेखनीय नाम हैं अभिनेता-अभिनेत्री कँवलजीतअनुराधा पटेलसुशांत सिंहअमित बहलगुलशन पांडेय थे। राजा बुंदेला ने सातों दिन रंगारंग सांस्कृतिक प्रोग्राम के संचालन की महत्वपूर्ण जिम्मेदारी टीकमगढ़ नगर की प्रसिद्ध कवयित्रीसाहित्यकाररंगकर्मी गीतिका वेदिका को सौंपी। सात दिनों तक चलने वाले इस महोत्सव में उमड़ने वाली हज़ारों की भीड़ ने अपनी सफलता की कहानी खुदबखुद बयां की। यह फ़िल्म फेस्टिवल से कहीं अधिक जन-जन का महोत्सव लगा। यह अद्वितीय त्योहार फ़िल्म-महोत्सव महान अभिनेता स्वर्गीय शशि कपूरओमपुरी एवं टॉम आल्टर को भावपूर्ण श्रद्धांजलि के साथ समर्पित किया गया। इस समारोह ने बुन्देलखण्ड क्षेत्र में फिल्मों से सम्बंधित विकास के द्वार खोले जाने की सम्भावना विकसित की है. बस देखना ये है कि फिल्म जगत से जुड़े लोग बुन्देलखण्ड क्षेत्र की प्रतिभा का, यहाँ के संसाधनों का कैसे उपयोग कर पाते हैं. 


गीतिका वेदिका (साहित्यकारगीतकार)
9826079324

28/12/2017

इतिहास की तंग गलियों में जनपद जालौन - 4

देवेन्द्र सिंह जी - लेखक 
महाभारत के काल में हम पाते हैं कि यहाँ पर चेदियों का शासन था। दमघोष के पुत्र शिशुपाल ने इस क्षेत्र से कुरु वंश का शासन समाप्त करके चेदि राज को पुन: स्थापित कर लिया। यह वही शिशुपाल है जिसका वध श्रीकृष्ण ने युधिष्ठिर के राजसूर्य यज्ञ में किया था। इस समय बहुत से प्रमुख चेदियों के बारे में पढ़ने को मिलता है। चेदिराज उपरिचर, वसु की पत्नी गिरिका का भाई वसु का सेनापति था नकुल की पत्नी करनमति चेदि थी। पांडवों ने बनवास का बहुत समय चेदियों के यहाँ व्यतीत किया था। भीम की पत्नी चेदि थी। दमघोष, शीशपाल, धृष्टकेतु, सुकेतु, शरभ, आदि सब चेदि ही थे। शिशुपाल की माता श्रुतिकीर्ति और कुंती आपस में बहिनें थीं। इनके भाई बासुदेव थे। वसु के चार पुत्रों के अलावा निषाद स्त्री से एक पुत्र और एक पुत्री थी। पुत्र ने अपने बाहुबल से मत्स राज कायम किया लेकिन कन्या अपने निषाद परिवार के साथ यमुना के किनारे ही रही जो कुरु राज का क्षेत्र था। शांतुन की पत्नी सत्यवती का जन्म इसी परिवार में हुआ था।  वेदव्यास, चित्रगुप्त, और विचित्रवीर सत्यवती के ही पुत्र थे। महाभारत के युद्ध में चेदि पांडवों के साथ रहे उनके राजा शिशुपाल का उतराधिकारी धृष्टकेतु ने अपने भाई शरभ के साथ पांडवों का साथ दिया था। इसी आधार पर ई०जे०रेपसन ने कैम्ब्रिज हिस्ट्री आफ इंडिया भाग प्रथम में लिखा कि महाभारत के युद्ध के बाद भी जालौन के क्षेत्र में चेदि राज बना रहा।

महाभारत के बाद चेदियों के बारे में कुछ ज्यादा पता नहीं चलता है। पुराण भी इस बारे में मौन हैं। लेकिन ईसा से ६००वर्ष पूर्व उत्तरभारत के सोलह जनपदों का जब उल्लेख मिलता है तब उसमें चेदि राज का उल्लेख है। पोलिटिकल हिस्ट्री आफ एंसियंट इण्डिया में एच०सी०राय लिखते हैं कि इस काल में यहाँ पर वितिहोत्रासों का अधिकार था। ये कौन थे इसके बारे में ज्यादा कुछ नहीं मिला। लेकिन ईसा पूर्व सातवी सदी के प्रारंभ से जालौन का इतिहास स्पष्ट और निश्चित हो जाता है। इसके पूर्व प्रत्येक घटना अस्पष्ट और काल निर्णय अनिश्चत है।

जैन और बौद्ध धार्मिक ग्रंथों से पता चलता है कि इस युग में समस्त उत्तरी भारत में में १६ राज्य थे। इस युग की प्रमुख घटना मगध का उत्कर्ष है। बिम्बसार मगध की महानता का वास्तविक संस्थापक था। उसका उतराधिकारी अजातशत्रु फिर उदयन, जो उसका पौत्र था, का विवरण मिलता है। उदयन के उतराधिकारी नन्दिवर्धन और महानन्दीन थे। कहा जाता है कि महानन्दीन के अवैध पुत्र महापदमनन्द ने नन्द वंश की स्थापना की। उसी ने मगध की सीमाओं का विस्तार किया। इतिहासकारों का मानना है कि ईसा के चार सौ वर्ष पूर्व जालौन का क्षेत्र महापद्मनन्द के अधिकार में आया, लेकिन राज्याभिषेक के वर्ष के बारे में इतिहासकारों में मतभेद है। इतिहासकार एफ०ई०प्रगेटीयर के अनुसार ३८२ बी०सी० आर०के०मुकर्जी के अनुसार ३६४ बी०सी० और एच०सी०राय चौधरी के अनुसार यह तिथि ३५४ बी०सी० है। पुराणों में इसके बारे में बहुत अच्छा नहीं लिखा गया है। भगवत पुराण की एक टीका के अनुसार इसके पास दस पदम सेना तथा उतनी ही संपति थी। इसी कारण इसको महापदम कहा गया है। इसने सबको गद्दी से हटा कर एकछत्र राज्य कायम किया। इसके राज्य की सीमाएं हिमालय से विन्ध्याचल तक थीं। अतः जनपद जालौन भी इसके राज में रहा होगा। इसको उत्तरी भारत का पहला सम्राट भी कहा जाता है। मत्स्य पुराण के अनुसार यह ८८ वर्ष तक जीवित रहा। वायु पुराण में इसके २८ वर्ष तक शासन करने की बात कही गई है। इससे अनुमान लगता है कि ईसा पूर्व ४२९ में इसकी मृत्यु हुई। इस वंश के ८ राजाओं के बारे में पुराणों में उल्लेख है। इसके पुत्र घनानंद के बारे में कहा गया कि वह भी बहुत शक्तिशाली था लेकिन साथ ही बहुत क्रूर तथा लोभी भी था। जनता इससे घृणा करती थी। ३२१ ई०पू० तक नन्द वंश के शासक इस क्षेत्र को अपने अधिकार में किए रहे। इस वंश के अंतिम नरेश घनानंद को चन्द्रगुप्त मौर्य ने चाणक्य की मदद से ३२१ बी०सी० में सिंहासनचुत्य कर दिया और चाणक्य की मदद से मौर्य वंश की स्थापना की।  

भगवती-सूत्र में मोरियपुत्व का उल्लेख मिलता है। इनकी राजधानी पिप्लीवाना में थी। वहाँ के निवासी मोरिय (मौर्य) या मोरिय्पुत कहलाते थे। मोरिय नामक स्थान से संबंध होने के कारण चन्द्रगुप्त मौर्य कहलाया। इतिहासकारों ने इसको शाक्य मूल क्षत्रिय वर्ण का कहा है। इसने अपनी वीरता और चाणक्य की मदद से विशाल साम्राज्य खड़ा किया। चन्द्रगुप्त के दरबार में रह रहे यवन राजदूत मेगस्थनीज ने इंडिका पुस्तक में इसके राज की सीमा पूर्व उत्तर में हिमाड्स (हिमालय) पर्वत, दक्षिण व पूर्व में समुद्र और पश्चिम में सिन्धु बतलाई है। इससे पता चलता है कि जालौन भी मौर्य साम्राज्य का अंग था। वायु पुराण के अनुसार चन्द्रगुप्त ने ई०पू०२९८ में राज्य अपने पुत्र बिन्दुसार (२९८-२७३) को सौंप कर गृह त्याग दिया। जैन अनुश्रुतियों के अनुसार वह उपवास और तप करके मृत्यु को प्राप्त हुआ। बिन्दुसार ने अपने पुत्र अशोक को अवन्ति का शासन सौंपा जिसकी राजधानी उज्जैन और उप राजधानी विदिशा थी। इस समय जालौन अशोक के अधीन था। अशोक (२७३-२३३) ही बिन्दुसार के बाद साम्राज्य का उतराधिकारी हुआ। गजानन माधव मुक्तिबोध की पुस्तक भारत इतिहास और संस्कृति के अनुसार अशोक की मृत्यु के बाद मौर्य शासक अपने राज के पतन को रोक नही सके, प्रतापी मौर्य साम्राज्य सदा के लिए अस्त हो गया। अंतिम मौर्य सम्राट बृहद्रथ था। वह एक कमजोर शासक था। इसका फायदा उठा कर उसके सेनापति पुष्यमित्र नेबृहद्रथ की हत्या करा कर मौर्य साम्राज्य का अंत कर दिया। इस अध्ययन के आधार पर कहा जा सकता है कि मौर्यों का शासन इस क्षेत्र (जालौन) में १३७ वर्षों (३२१-१८४ बी०सी०) तक रहा था।


आज यहीं तक। 
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© देवेन्द्र सिंह  (लेखक)

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इतिहास की तंग गलियों में जनपद जालौन - 3

देवेन्द्र सिंह जी - लेखक 
आर०सी०मजुमदार और आर०डी० पुश्लकर की पुस्तक द हिस्ट्री एंड कल्चर आफ इंडियन पीपुल भाग दो के अनुसार यहाँ जो आर्य सबसे पहले वे चेदि थे। चेदि राज बहुत पुराना कहा जाता है। इनके दो जगहों पर जाने की बात कही जाती है। एक दल नेपाल गया तथा दूसरा वत्स राज और कुरु राज के मध्य यमुना के किनारे (आधुनिक बुंदेलखंड) में आया। शुरू में ये आर्य यमुना और केन नदियों के मध्य में बसे बाद में नर्मदा तक फैले। इनकी राजधानी शुक्तमती थी। इतिहासकारों के अनुसार शुक्तमती आज का सागर (म०प्र०) है, लेकिन कुछ इतिहासकारों के अनुसार चेदियों की राजधानी त्रिपुरी में थी। बौद्ध ग्रन्थ Anguttara Nikaya में दस जनपदों में चेदि महाजनपद का उल्लेख मिलता है। Dr Binod Bihari Satpathi ने अपने ग्रन्थ Indian Histography के पेज ५६ में लिखा कि शिव जातक के अनुसार चेदि महाजनपद की राजधानी Arithapura में थी। यह कहाँ है मुझको अनुमान नहीं है। कुछ समय चेदि राज को कुरु वंश के वसु ने जीत कर चेदि राज का अंत कर दिया।

इसके बाद पौराणिक परंपरा के अनुसार मनु के पौत्र चन्द्र वंश के संस्थापक एल जो सूर्य वंश के इक्ष्वाकु का समकालीन था के गंगा, यमुना मालवा और पूर्वी राजस्थान पर अधिकार करने का विवरण मिलता है। अतः अपना जालौन जिला भी उसके राज के अंतर्गत आ गया। एल के पुत्र ययाति हुए वे भी यहाँ अधिकार किए रहे। राज के बटवारे में ययाति के बड़े पुत्र यदु को चम्बल, बेतवा, केन नदियों वाला भाग मिला, इससे कहा जा सकता है कि जालौन का क्षेत्र भी यदु के अधिकार में रहा होगा। यदु के वंशज यदुवंशी कहलाए। कुछ समय बाद चन्द्रवंश की मुख्य शाखा से उत्पन्न हैहयों के उदय से यादव वंश का पराभव हो गया, लेकिन कुछ पीढ़ी बाद अयोध्या के राजा सगर द्वारा हैहयों का पराभव हुआ। इसका फायदा विदर्भ के यादवों ने उठाया और उत्तर भारत के भू-भाग पर अधिकार कर लिया। कुछ समय बाद कुरु की पांचवी पीढ़ी में वसु ने यादवों के चेदि राज पर अधिकार कर लिया। प्रो०अर्जुन चौबे काश्यप ने आदि भारत में लिखा कि वसु ने चेदोपरिचर (चेदियों के ऊपर चलने वाला) की उपाधि धारण की। जालौन का क्षेत्र उतराधिकार में वसु के पुत्र प्रत्यग्रह को मिला। प्रत्यग्रह से यह शाखा चलती रही। चेदियों का उल्लेख ऋग्वेद में मिलता है। वसु चेदि को इंद्र का मित्र बतलाया गया है। उसके की पुत्रों के नाम मिलते हैं जो विभिन्न भागों के शासक थे। महाभारत में भी कई प्रमुख चेदियों का उल्लेख मिलता है।


आज इतना ही आगे का हाल फिर अगली पोस्ट में। 
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© देवेन्द्र सिंह  (लेखक)

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27/12/2017

इतिहास की तंग गलियों में जनपद जालौन - 2

देवेन्द्र सिंह जी - लेखक 
ए०घोष ने इंडियन आर्कियोलोजी (१९६३-६४) ए रिव्यू में लिखा कि आर्यों के आगमन के पहले से ही यहाँ पर कोल, भील, शबर, गोंड से मिलती-जुलती जातियों का निवास था। डा० सुनीत कुमार चटर्जी ने कहा कि आर्यों ने द्रविणों को दास, आग्नेय जाति वालों को कोल, भील और निषाद तथा मंगोल जाति के लोगों को किरात कहा है। आर्यों ने इनको अनास भी कहा है। सुयणाचार्य ने अनास का अर्थ आस्य रहित अर्थात वाणी विहीन किया है अर्थात अनस वे थे जिनकी बोली आर्यों की समझ में नहीं आती थी। पुराणों में यक्ष, राक्षस, नाग, किरात आदि का उल्लेख है यह आर्येतर जातियों के अस्तित्व की ही सूचना है। आर्यों का यहाँ पर आने के बाद यहाँ के निवासियों कोई संघर्ष नहीं हुआ। उन्होंने स्थानीय निवासियों को यहाँ से जाने के लिए मजबूर नहीं किया। प्राचीन साहित्य में इस बात का कोई प्रमाण नहीं मिलता कि आर्यों का यहाँ पर रहने वालों से कोई युद्ध हुआ था। ज्यों-ज्यों समय व्यतीत होता गया आर्य यहाँ के निवासियों में मिश्रित हो गये। जो जातियां यहाँ पर निवास करती थीं उनकी भी अपनी सभ्यता और संस्कृति थी। आर्यों ने उनकी सभ्यता और संस्कृति से छेड़छाड़ भी नहीं की बल्कि उनको तथा उनकी सभ्यता और संस्कृति को अपनाने में कोई भी गुरेज नहीं किया। वैदिक देवताओं के साथ-साथ उनके देवता जैसे नाग, गण आदि को भी स्थान मिलना इस बात का पुख्ता प्रमाण है। अधिकांश विद्वानों का यही मानना है कि जो आर्य यहाँ पर आए उन्होंने आपस में मिश्रित होकर यहाँ एक जनसमूह की रचना की। कहा जा सकता है जालौन क्षेत्र में स्थानीय आबादी, जिसके देवता और संस्कृति अलग-अलग थे, का उदय होने लगा था। लगता है वैदिक युग के आर्य मोक्ष के लिए ललायित नहीं थे। वे मानते थे कि सारी सृष्टि किसी एक प्रच्छन्न शक्ति से चल रही है तथा उस शक्ति की आराधना करके मनुष्य सब कुछ प्राप्त कर सकता है। वैदिक प्रार्थनाएँ सबल, स्वस्थ्य, प्रफुल्लित जीवन को प्राप्त करने के लिए हैं।

हम सौ वर्षों तक जियें/ हम सौ वर्षों तक अपने ज्ञान को बढ़ाते रहें/ हम सौ वर्षों तक आनन्दमय जीवन व्यतीत करें/ जो स्वयं उद्योग करता है, इंद्र उसी की सहायता करते हैं/ हम सदा प्रसन्नचित रहते हुए उदीयमान सूर्य को देखें।

आर्य भावुक और प्रकृति-पूजक थे। उनके प्रधान देवता अग्नि, इंद्र, वरुण, पूषण, सोम, उषा, थे। आर्य और अनार्य सभ्यता के प्रादुर्भाव का स्पष्ट प्रमाण आर्यों के उस दृष्टिकोण से प्राप्त होता है जो उन्होंने अनार्यों के लिंगम और उस ईश्वर के प्रति, जिसका वह प्रतीक है, अपनाया। इस विषय में ऋग्वेद में (७,२१,५) एक महत्वपूर्ण उल्लेख मिलता है। जिसका देवता लिंग है वे हमारे पुण्यस्थल में प्रविष्ट न होने पावें। बाद में इस लिंग उपासना के प्रति आर्यों का जो भय था वह जाता रहा। शादी-विवाह के द्वारा यहाँ के लोगों के साथ संबंध बढ़ा तब शिव भी आर्यों के देवता हो गए। बाद में तो अनार्यों के देवता शिव, पशुपति अधिक महत्वशाली स्थान प्राप्त कर लेते हैं और बी०एन०लूनिया ने तो भारतीय सभ्यता तथा संस्कृति का विकास में लिखा कि यजुर्वेदके युग में से तो शिव बड़े महान देवता का रूप प्राप्त कर लेते हैं। जालौन के प्राचीन इतिहास की यही रुपरेखा मिलती है। बहुत निश्चयात्मक रूप कुछ नही कहा जा सकता है। आगे बढने से पहले जालौन के नामकरण के बारे में चर्चा करते हैं, फिर आगे चलें।

जालौन के नामकरण के संबंध में एक सामान्य विश्वास यह है कि इसका नाम जालिम नाम के एक ब्राह्मण के साथ जुड़ा है जिसने इसको बसाया। एक मान्यता यह भी है कि किसी जालिम सिंह कछवाहा द्वारा यह स्थान बसाया गया उसी के नाम पर यह स्थान बिगड़ के जालवन फिर जालौन हुआ। जालौन के इतिहास के बारे में निश्चयात्मक रूप से कुछ कहना बड़ा मुश्किल है, लेकिन एक बात जो निश्चित रूप से कही जा सकती है वह यह है कि यह स्थान पुरातन काल से ही मुनियों, संतों द्वारा पोषित होता रहा है। तो आइये इस दृष्टिकोण से भी नामकरण को देखें और सोचें।

शंकराचार्य ने वेद और वेदांत के प्रचार-प्रसार के लिए सभी संन्यासियों को संगठित करके उन्हें दस वर्गों में विभाजित किया था, जिन्हें गिरि, पूरी, सरस्वती, अरण्य, तीर्थ, आश्रम, पर्वत, भारती तथा सागर आदि नामों से जाना जाता है। इसी संप्रदाय की एक सखा वनभी थी। जिसकी एक पीठ लगभग एक हजार वर्ष पूर्व जालौन के उत्तरी छोर में यमुना नदी के किनारे पर थी। यह स्थान अब जालौन खुर्द कहलाता है। इसी वन शाखा की गद्दी पर पीठाधीश्वर जाल नामक ऋषि थे। उनके नाम जाल में वन जोड़ने से जालवनबनता है। उनका आश्रम यहाँ होने के कारण यह स्थान जालवन कहलाने लगा। बाद में यह पीठ पंचनदा में कंजौसा चली गई। कंजौसा के सभी महंतों के नाम के साथ अभी भी वन जुड़ा रहता है। १८७४ के जालौन के दरबारियों की जो सूची मैंने कुछ दिनों पहले पोस्ट की थी उसमे भी क्रम संख्या ३८ पर कंजौसा के महंत जगदीस वन का नाम देखा जा सकता है। इससे इस वन सखा का महत्व का पता चलता है। तो जाल ऋषि के नाम पर अगर यह स्थान जालवन हो गया तो क्या कोई आश्चर्य की बात तो नहीं है। लोग यह भी सवाल कर सकते हैं कि जालवन से यह जालौनकैसे हो गया? तो इस पर मेरा कहना यह है कि यह उर्दू भाषा के कारण हुआ क्योंकि उर्दू में जालवनको जालौनभी पढ़ा जा सकता है। उच्चारण अशुद्ध होने लगा। एक बात और आपको बता दूँ, पुराने बहुत से दस्तावेजों में इसका नाम जालवन भी मिलता है। अपने यहाँ के भूतपूर्व विधायक गरीबदास जी के अनुसार सन १९३२ के रामलीला विज्ञापन के पर्चों में जालौनको जालवनही लिखा जाता था।


तो जालौन के नामकरण की चर्चा के बाद आज यहीं तक। 
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© देवेन्द्र सिंह  (लेखक)

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