Sunday, July 9, 2017

१८५७-५८ की क्रांति में बाँदा के नवाब अलीबहादुर का दुश्मन अजयगढ़ राज

देवेन्द्र सिंह (लेखक)
इधर तो नवाब अलीबहादुर धन की तंगी से जूझ रहे थे ऊपर से अजयगढ़ राज नाक में दम किये था। यह अजयगढ़ राज कहाँ था और उसकी सीमायें क्या थी, इसके बारे में थोडी सी बातें साझा करके आगे चलें तो ठीक रहेगा। १९०७ में प्रकाशित ईस्टर्न स्टेट गजेटियर भाग vi में अजयगढ़ के बारे में लिखा गया है
The Ajaigarh state was composed of two tracts, one surrounding the chief town, the other lying to the south of it near maihar. The former tract, which had an area of about 258squre miles, was situated between 24.45’ and 25.2’N., and 80.4’ and 80.32E., the southern tract with an area of 513 between 24.4 and 24.45N., and 79.56’ and 80.38’E., giving a total area of 771 square miles. Chief town of state situated at the foot of the old fort in 24.54’N., and 80.18’E.While the matter was under reference to the Court of Directors, the Mutiny broke out. During the Mutiny the Rani sent two guns, 200 matchlock men and some cavalry to assist Mr. Chester, collector of Banda. The Ajigarh troops made themselves very useful in feeding the chaukis of the town, and their presence(especially of the guns) served to keep our Native Infantry detachment in awe and did good service in restoring confidence to the town people.

बाँदा जिला तथा अजयगढ़ राज पूर्व में महाराजा छत्रसाल के राज के भाग थे, बाद में बाँदा वाला भाग पूना के पेशवा के कहने से वर्तमान नवाब अलीबहादुर के पूर्वज अलीबहादुर प्रथम ने जीत कर नवाब का ख़िताब प्राप्त करके बाँदा को अपनी राजधानी बनाया। छत्रसाल के वंशज बाँदा को वापस लेने या पाने के लिए हमेशा लालायित रहते थे। राजा विजय सिंह के निधन के बाद चूँकि कोई उतराधिकारी नहीं था अतः अंग्रेजों ने राजा कौन बने मामले को कुछ समय के लिए पेंडिंग में डाल दिया था। रणजोर दौउआ और रानी दोनों ही राज पर अधिकार चाहते थे। इसी समय १८५७ की क्रांति हो गई। इस समय रानी ही राज अस्थायी तौर से चला रही थी। अजयगढ़ राज ने जब बाँदा में अशांति और बवाल देखा तो इसका फायदा उठाने के लिए रणजोर दाउआ को सेना सहित बाँदा को हस्तगत करने के लिए भेजा। बाँदा से लगी हुई निम्नी नदी दोनों की सीमा थी। नदी के उस तरफ अजयगढ़ का किला है। रणजोर अजयगढ़ के किला में आकर जम गया और वहाँ से बाँदा के इलाके में घुसपैठ करने लगा। इसी क्रम में एक दिन रणजोर ने नवाब के कुछ गांवों पर कब्जा कर लिया। ये गाँव शुरू से ही विवादित थे। रणजोर इन गांवों से आधा राजस्व माँगता था मगर नवाब पांच आना ही देने को तैयार था।

रणजोर बहुत ही चालक था उसने बाँदा के अन्य लोगों से संपर्क करना शुरू किया जिनका झुकाव नवाब की तरफ नहीं था। बाँदा जिले में इंसाउल्ला नाम का एक बड़ा मालगुजार था और उसका झुकाव अंग्रेजों की तरफ था। रणजोर ने उस पर डोरे डालना शुरू किया। अलीबहादुर को जब यह बात पता चली तो वह बड़ा परेशान हुआ। नवाब ने अपने सलाहकारों की मदद से इंसाउल्ला को अपनी खुद की खड़ी की गई फ़ौज का सेनापति नियुक्त किया। अगर वह ऐसा न करता तो इंसाउल्ला रणजोर से मिल जाता और नवाब को शिकस्त देने में कोई कसर न छोड़ता।

निम्नी पार नदी पर अजयगढ़ राज की तरफ से एक सेना नायक और बीस सिपाही तैनात थे। अजयगढ़ की रानी ने दो परवानों के साथ मुसाहिब जान को भेजा। रानी ने नवाब को लिखा था कि दोनों में लड़ाई नहीं होनी चाहिए, अतः वह अपनी फ़ौज निम्नीपार के मोर्चे से हटा ले। नवाब ने इस पत्र के मिलने के बाद अपने सिपाहियों को वहां से हटा कर आदेश किया कि अब वहाँ पर केवल ४-६ सिपाही ही रहें ताकि अजयगढ़ राज के ज्यादा आदमी बाँदा की तरफ न आने पावें और अगर कुछ लोग आना चाहें तो उनको रोका-टोका न जाय लेकिन वे बिना हथियार के ही इस तरफ आएं। रणजोर ने इस आदेश को मानने से इनकार कर दिया और कहा कि जब रानी खुद उसको आदेश देंगी तभी वह इस कागज के आदेश को मानेगा। दौउआ के इस रूप से नवाब इतना सहम गया कि उसने आदेश कर दिए कि मोहर्रम के ताजिए अबकी बार निम्नीपार जलमग्न करने के लिए न ले जाएँ।  

इधर यह सब हो रहा था तभी एक और सूचना ने नवाब के होश उड़ा दिए। उनके गुप्तचरों ने सूचित किया कि आरा (बिहार) की कुछ फ़ौज बाँदा में नवाब के इलाके के बिलगांव गाँव में आकर डेरा डाल चुकी है और उनकी नीयत क्या है इस बारे में कुछ भी कहा नहीं जा सकता है। बिलगांव में एक बाजार सा लग गया था, ये सैनिक बाजार से ही सब राशन आदि खरीदते थे। नवाब ने अंग्रजों की देशी फ़ौज जो बाँदा में अभी भी रुकी हुई थी, के सूबेदार भवानी सिंह से कहा कि वे आरा की रेजिमेंट की नीयत के बारे में पता करें। सूबेदार भवानी सिंह अपनी कंपनी के सैनिकों के साथ गया और आरा के सैनिकों से मुलाकात करके उनके मिशन के बारे में पता किया। सब प्रकार से संतुष्ट होकर भवानी सिंह पूरी रेजिमेंट को लेकर बाँदा आया और उनके नायकों से नवाब की मुलाकात कराई। नवाब ने इन सबका बड़ा मान किया। इन सब सैनिकों ने नवाब को बतलाया कि वे सब धर्म की रक्षा के लिए दिल्ली जा रहे हैं। निम्नीपार में रणजोर दौउआ अभी भी अपनी फ़ौज के साथ पड़ा था।


तभी नवाब के दिमाग में एक विचार कौंधा। वह क्या था इस बारे में अब अगली पोस्ट में... 

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© देवेन्द्र सिंह  (लेखक)


कॉपीराईट चेतावनी - बिना देवेन्द्र सिंह जी की अनुमति के किसी भी लेख का आंशिक अथवा पुर्णतः प्रकाशन कॉपीराइट का उल्लंघन माना जायेगा. ऐसा करने वाले के विरुद्ध कानूनी कार्यवाही की जा सकती है. जिसके लिए वह व्यक्ति स्वयं जिम्मेवार होगा.

Saturday, July 8, 2017

बाँदा नवाब अलीबहादुर और 1857 की क्रांति

लेखक - देवेन्द्र सिंह 
बाँदा में क्रांति होने पर नवाब अलीबहादुर का शासन तो स्थापित हो गया मगर क्रांति के लिए धन की आपूर्ति कैसे हो यह एक गंभीर मुद्दा था। इसके साथ ही अजयगढ़ राज्य जो अंग्रेजों का सहायक था की तरफ से भी मुसीबतें खड़ी की जा रहीं थी। इन दोनों से अलीबहादुर कैसे निबटे आज उसी पर कुछ चर्चा, लेकिन पहले धन की आपूर्ति के बारे में।

सबसे पहले नवाब ने अपने कुछ सैनिक मौदहा भेज कर वहाँ की तहसील को लुटवा लिया। हमीरपुर से वैसे भी सब अंग्रेज अधिकारी भाग गए थे, अतः मौदहा के तहसीलदार ख्वाजाबक्स ने भी क्रांतिकारियों का विरोध करना ठीक नही समझा बल्कि वह खुद उनके साथ मिल गया। मौदहा की तहसील से पन्द्रह हजार रुपए ही मिले इतने से तो कुछ होना हवाना नहीं था। विद्रोही सैनिकों की मांग थी कि नवाब हर सैनिक को १६ रुपए महीने और हर सवार सैनिक को २५ रुपए महीने के हिसाब से चार दिन के अन्दर वेतन दें। नवाब को हथियार और गोलाबारूद भी खरीदना था। अब वह क्या करे, इसी उधेड़बुन में वह था तभी उसके करिन्दा खुमान ने उसको सलाह दी की तिरौहाँ(कर्वी) के मराठा जागीरदार नारायणराव और माधवराव से आर्थिक मदद लेने का प्रयास किया जाय। अलीबहादुर को भी आशा की किरण दिखलाई पड़ी अतः उसने खुमान को ही इस काम के लिए तिरौहाँ भेजा। तिरौहाँ वालों को जब १५जून,१८५७ को बाँदा में कर्वी के ज्वाइंट मजिस्ट्रेट कोकरेल के मारे जाने की सुचना मिला थी तभी से वे भी कर्वी के क्षेत्र में अपना अधिकार करने को लालायित थे। उन्होंने नवाब को आर्थिक मदद देने की इच्छा नवाब के करिन्दा खुमान से जाहिर की। खुमान से सूचना मिलते ही नवाब नारायणराव और माधवराव से मिलने के लिए १५ नवम्बर को तिरौहाँ के लिए चला। 

अलीबहादुर को जिले में एक मजबूत साथी की जरूरत थी जो उसकी हर प्रकार से मदद कर सकता हो। वह जानता था कि नारायणराव और माधवराव उसके साथ तभी शामिल होंगे जब उनको विश्वास होगा कि मैंने अंग्रेजों को जिले से भगा दिया है और वे उस पर विश्वास कर सकते हैं। अतः उसने अपना रुतबा दिखाने के लिए अपने साथ दो हजार सैनिक लिए। पांचवी इररेगुलर पलटन के दस्ते उसके बाडीगार्ड के रूप में उसके साथ चल रहे थे। तिरौहाँ में नवाब का भव्य स्वागत हुआ। तिरौहाँ के जागीरदार का मुख्य सलाहकार राधा गोविन्द बहुत चालक और होशियार व्यक्ति था। उसने रुपए देने के साथ साथ कुछ शर्तें नवाब के सामने रखीं। शर्त यह थी कि पहले इलाके का निर्धारण हो जाय कि कौन से इलाके किसके पास रहेंगे जहाँ से वे रेवन्यू की उगाही करेंगे। इस शर्त को मानने के अलावा नवाब के पास कोई अन्य चारा ही नही था। मानना मजबूरी थी अतः तय हुआ कि परगना छीबू, दर्सेंडा, बदौसा तथा बबेरू का आधा इलाका नारायणराव और माधवराव के अधिकार में रहेगा तथा परगना पेलानी, सिमौनी, बाँदा, और आधा बबेरू नवाब के पास रहेंगे। इसके बाद नवाब दो लाख की रकम लेकर बाँदा लौटे। सैनिकों की तनखाह बाटने के बाद धन की कमी फिर भी रही।

सैनिकों ने एक दूसरा रास्ता धन प्राप्त करने का निकला। उन्होंने बाँदा के महाजनों से संपति गिरवी रख कर रुपया देने को कहा। इस पर महाजन तैयार हो गये। सैनिकों ने नवाब से गहने व जवाहरात आदि लिए और महाजनों के पास रख दिए, लेकिन एक गडबडी हो गई। सैनिकों ने देखा कि बाँदा के महाजनों के पास बहुत रुपया है तो उन्होंने रुपया तो लिया ही रेहन वाले जवाहरात आदि भी नहीं दिए।
नवाब ने चरखारी के राजा रतनसिंह से भी आर्थिक मदद का अनुरोध किया मगर रतन सिंह ने साफ मना कर दिया क्योंकि वह तो अंग्रेजों का सहायक था नवाब के कर्मचारियों ने हर व्यापरी से चार सौ से पांच सौ रुपए वसूल किए जिससे सैनिकों का वेतन दिया जा सके। नवाब के कर्मचारी तो बाँदा के हर आदमी की माली हालत को जानते थे ही २नवम्बर को मीरन साहब और मिर्जा विलायत हुसेन ने शहर के व्यापारी रतीराम की मकान की नींव को खुदवा डाला। इस खुदाई से उन्हें दो हीरे, सोना, चाँदी, और लगभग ७५००० रुपये नगद मिले। इसमें से ३५००० रुपए रसद आदि खरीदने में ही समाप्त हो गए।

अंग्रेजों के समय के बहुत से नौकर जैसे फरहतअली तहसीलदार बाँदा, चिरंजीलाल तहसीलदार स्योढ़ा, बाँदा के कोतवाल फजल मोहम्मद आदि सब ने नवाब की सेवा में आना स्वीकार कर लिया था इनको नवाब से १०० रु० हर महीने वेतन मिलता था। इन सबको जिले के एक एक आदमी की हैसियत मालुम थी। इनके बतलाने पर नवाब ने शिवचरन का हाथी अपने यहाँ मंगवा लिया(कन्सल्टेशन न०२०५ दिनांक, २९-१-१८५८ दुर्गा प्रसाद का बयान, राष्ट्रीय अभिलेखागार, नई दिल्ली) । जमुना प्रसाद की दस हजार रुपए मूल्य की संपति भी नवाब ने कब्जे में ले ली। इतना ही नही नवाब ने बाँदा के मुन्स्फी के वकील बाबु बिहारीलाल को धन न देने कारण कैद में डलवा दिया। कुछ दिनों बाद दो हजार रुपए दे कर वे मुक्त हुए। इस घटना से वे इतने घबरा गए कि बाँदा ही छोड़ कर चले गए। इसके बाद भी धन की कमी बनी ही रहती थी। 

धन प्राप्त करने के लिए नवाब को हर हथकंडे अपनाने पड़ रहे थे। बाँदा के कोतवाल का भतीजा नवाब की तथा क्रांतिकारियों की गतिविधियों की सुचना अंग्रेज अधिकारीयों को पहुँचा देता था। नवाब ने पता चलने पर उसको पकडवा लिया और भारी दंड वसूल किया। नवाब ने एक और तरीका धन प्राप्त करने का निकला। अंग्रेजों के समय के कीरत पुरवार, काशी, नन्हे, और मदन दलाल आदि कर्मचारियों ने नवाब की नौकरी स्वीकार नहीं की थी, नवाब उनसे बहुत नाराज था अतः बाँदा में उनके घर जला दिए गए और उनकी करीब साढ़े चार लाख रुपए की संपति जब्त कर ली। नवाब ने कभी बाँदा के कश्मीरी सेठ जमुना दस के पास चाँदी का हाथी का हौदा और चाँदी की एक घडी रेहन रख कर रुपया लिया था उसको जमुनादास से जबरजस्ती वापस ले लिया। आर्थिक तंगी अभी भी थी अतः नवाब ने एक बार फिर अपने जवाहरात गिरवी रख कर बीस हजार रुपए और एक बार चालीस हजार रुपए प्राप्त किए और क्रांति को जारी रखा। 

इस प्रकार हम देखते हैं कि क्रांति को जारी रखने के लिए नवाब के पास धन की बहुत कमी थी उसने इसके लिए हर प्रकार के हथकंडे अपनाएं। तो क्या इन कार्यों के लिए नवाब को दोष दिया जा सकता है? मेरा मानना है कि यह सब उसको मजबूरी में करना पड़ा था। उसने इस धन में से एक भी पैसा अपने ऐशोआराम के लिए खर्च नहीं किया था। बल्कि जब भी आवश्यकता पड़ी उसने अपने निजी जेवरात को रेहन रखने में जरा भी सोच विचार नही किया और गिरवी रखा।


यह मेरी अपनी सोच है। आप भी सोचिए। जरूरी नहीं कि मेरी और आपकी सोच एक समान ही हो। 

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© देवेन्द्र सिंह  (लेखक)

कॉपीराईट चेतावनी - बिना देवेन्द्र सिंह जी की अनुमति के किसी भी लेख का आंशिक अथवा पुर्णतः प्रकाशन कॉपीराइट का उल्लंघन माना जायेगा. ऐसा करने वाले के विरुद्ध कानूनी कार्यवाही की जा सकती है. जिसके लिए वह व्यक्ति स्वयं जिम्मेवार होगा.

Friday, October 28, 2016

बौद्धिक ज्ञान प्रतियोगिता 2016 का अंतिम परिणाम

डॉ० दिनेश चन्द्र द्विवेदी जी की स्मृति में आयोजित
बौद्धिक ज्ञान प्रतियोगिता 2016 का अंतिम परिणाम

प्रथम तीन विजेता
क्रम
स्थान
नाम
रोल नं०
प्राप्तांक
1
प्रथम विजेता
वर्षा सिंह
160310
89
2
द्वितीय विजेता
शिवानी
160311
80
3
तृतीय विजेता
वैष्णवी यादव
160312
77

सांत्वना पुरस्कार
क्रम
नाम
रोल नं०
प्राप्तांक
1
सितेंद्र कुमार
160450
75
2
संदीप कुमार
161075
73
3
हर्ष मिश्रा
160303
73
4
विवेक सिंह
160901
72
5
अंकित यादव
160307
72
6
अनुज प्रताप भदौरिया
161002
72
7
अमन दुबे
160309
72
8
गगन वर्मा
160436
71
9
जयवीर सिंह
161085
70
10
नीरज पाल
160424
69

प्रेरणा पुरस्कार
क्रम
नाम
रोल नं०
प्राप्तांक
1
अभिषेक यादव
160427
68
2
आरती देवी
160333
68
3
सोहित यादव
160447
68
4
अभिषेक पाल
160423
67
5
अर्पित तिवारी
160404
67
6
कुलदीप सिंह
160742
67
7
राजन सिंह
160612
67
8
शिवानी राजपूत
160331
67
9
स्वाती मिश्रा
160728
66
10
शिवांश तिवारी
160610
66
11
कर्णवीर सिंह सेंगर
161084
64
12
आराधना
160340
64
13
ज्ञानेन्द्र कुमार
160338
64
14
रितु सेंगर
161074
64
15
गौरी
160448
63
16
आकाँक्षा भदौरिया
161001
62
17
पूजा वर्मा
160837
62
18
अमीषा
160324
61
19
प्रियंका देवी
160614
60
20
मोहनी गुप्ता
160806
60

बौद्धिक ज्ञान प्रतियोगिता 2016 के समस्त विजेताओं को एक पुरस्कार वितरण समारोह में पुरस्कृत किया जायेगा. जिसकी सूचना उन्हें व्यक्तिगत रूप से भेजी जा रही है.


पुरस्कार वितरण समारोह 19 नवम्बर 2016 को 
केशवदेव तिवारी महाविद्यालय, गोहन (जालौन) में आयोजित किया जायेगा. 

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