16/10/2008

रामपुरा का किला बना हैरिटेज संपत्ति

आज जालौन जनपद के लिए वाकई खुशी का दिन होना चाहिए। चम्बल, यमुना, सिंध, पहूज और क्वारी नदी के संगम क्षेत्र (यह क्षेत्र पचनदा के नाम से प्रसिद्द है) से 12 किमी दूर रामपुरा स्टेट में बने एक एतिहासिक किले को पर्यटन विभाग ने हैरिटेज किले के रूप में मान्यता दे दी है।
लगभग 700 वर्ष पुराना यह किला कछवाह राजाओं का है जो इतने वर्षों के बाद आज भी ज्यों का त्यों खडा हुआ है. क्षत्रियों (ठाकुरों) की एक उपजाति कछवाह बिरादरी के राजाओं ने रामपुरा जगह को आबाद किया था. राजा राम सिंह के नाम पर ही इस जगह का नाम रामपुर पडा था. 13 वीं शताब्दी में उन्हों ने इस किले का निर्माण करवाया था. सैकड़ों मजदूरों ने इस किले को अथक म्हणत के बाद तीन वर्षों में बनाया था. 18 एकड़ जगह में फैले इस किले के चारों तरफ़ सुरक्षा की दृष्टि से 30 फुट चौडी तथा 35 फुट गहरी खाई खोदी गई थी. इसमें हमेशा पानी भरा रहता था.
राजा राम सिंह की मृत्यु के बाद उनके वंशज अलग-अलग गाँवों में जाकर बस गए थे परन्तु उनके एक उतराधिकारी युवराज केशवेन्द्र सिंह ने इस एतिहासिक किले को हेरिटेज किले के रूप में बनाने के लिए बहुत प्रयास किए. लगभग 12 वर्षों की भागदौड़ के बाद पर्यटन विभाग इस किले को हेरिटेज किले के रूप में स्वीकारने को तैयार हुआ। केशवेन्द्र सिंह ने इस किले में वर्तमान में राजसी ठाठ-बाट से युक्त दो ड्राइंगरूम और पाँच डबल बेद रूम का निर्माण करवाया था.
उनका कहना है कि कोई भी देशी-विदेशी पर्यटक इस किले में पर्यटक के रूप में आकर उनके परिवार के साथ रह सकता है। अभी विगत दो वर्षों के दौरान इस किले में उनके मेहमान के रूप में चार जर्मन, दो फ्रांसीसी, दो ब्रिटिश नागरिकों सहित तमाम देशी-विदेशी पर्यटक परिवार के साथ इस किले का आनद उठा चुके हैं.
राजा राम सिंह की धरोहर अब समूचे बुंदेलखंड की धरोहर बन चुकी है या कहें कि समूचे उत्तर-प्रदेश की धरोहर हो चुकी है।

19/08/2008

मारें लातई-लात

ग्यानी तें ग्यानी मिलें,

करें ज्ञान की बात।

गधा से गधा मिलें,

मारें लातई-लात।

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जब दो बुद्धिमान व्यक्ति आपस में मिलते हैं तो वे ज्ञान की बातें करते हैं और जब दो मूरख आपस में मिलते हैं तो उनके बीच झगडा ही होता है।

25/07/2008

इन्हें कबहूँ न मारिये

बहु-ऋणी, बहु-धन्धीय,
बहु-बेटियाँ को बाप।
इन्हें कबहूँ न मारिये,
जे मर जैहें अपने आप॥

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पुराने समय से लोक-नीतिगत कहावत के रूप में प्रचलित है कि जो व्यक्ति बहुत अधिक क़र्ज़ में डूबा हो, जो बहुत सारे कामों को एक साथ करता हो और जो बेटों की चाह में बहुत अधिक बेटियों को जन्म दे चुका है, ऐसे व्यक्ति के सामने आफत-मुसीबतें आती ही रहती हैं. इस वजह से इन्हें परेशान नहीं करना चाहिए ये तो अपने कारनामों से ख़ुद ही परेशां रहते हैं.

03/07/2008

ताई बाई -- जालौन की पहली महिला क्रान्तिकारी

            स्वतन्त्रता प्राप्ति के लिए हुई क्रान्तियों अथवा संघर्षों में भारत का प्रथम स्वाधीनता संग्राम-1857 का विशेष महत्व है। यह अपनी शैली और अंग्रेजी साम्राज्य को हिला देने के कारण अनूठा माना जाता है। इस स्वाधीनता संघर्ष में मात्र सैनिकों ने ही भागीदारी नहीं कि अपितु देश के समूचे वर्गों ने अपनी सामर्थ्य लगाकर इस संघर्ष को अमर कर दिया। बड़े-बड़े राजा-महाराजाओं के साथ-साथ छोटी-छोटी रियासतों ने भी भाग लिया। सामन्त, पूंजीपति वर्ग के लोगों की हिस्सेदारी रही तो मजदूर, किसान भी पीछे नहीं रहे।
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            सन् 1857 की क्रान्ति में सभी अपनी क्षमता से अधिक आहुति देने की तत्परता दिखा रहे थे। उत्तर प्रदेश का जनपद जालौन भी किसी दृष्टि से इस संघर्ष में पीछे नहीं रहा। छोटे-छोटे संघर्षों के अतिरिक्त सन् 1857 में जनपद जालौन क्रान्तिकारियों की कर्मभूमि बन कर उभरा, यहां तक कि क्रान्ति की समस्त गतिविधियां बुन्देलखण्ड में अलग-अलग संचालित न होकर एकजुट रूप में कालपी से संचालित होने लगीं। नाना साहब, तात्या तोपे, रानी लक्ष्मीबाई, कुंवर साहब आदि की रणनीति यहीं पर बनती और क्रियान्वित होने लगती। इन सबसे अलग जनपद जालौन का नाम इस बिन्दु पर आकर ज्यादा आभासित प्रतीत होता है कि इन सभी प्रसिद्ध नामों से बहुत पूर्व जनपद की पहली महिला क्रान्तिकारी ताई बाई ने इस आन्दोलन में सक्रियता दिखा कर क्षेत्र के क्रान्तिकारियों के मध्य एक अलख जगा दी थी। यह जनपद जालौन का दुर्भाग्य ही कहा जायेगा कि इस क्षेत्र के ऐतिहासिक महत्व की ओर इतिहासकारों की ओर से ध्यान नहीं दिया गया। यह और बात है कि कुछ साहित्यकारों और संस्कृतिप्रेमियों के द्वारा समय-समय पर इस क्षेत्र की महत्ता को सामने लाया जाता रहा है।
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            जनपद जालौन के इतिहास में ताई बाई की स्मृति को मिटाने का कार्य तत्कालीन अंग्रेज अधिकारियों द्वारा ही शुरू कर दिया गया था। ताई बाई के द्वारा लगातार सात माह तक क्रान्तिकारी सरकार के रूप में कार्य किया गया। यह दुस्साहस अंग्रेजों को नागवार गुजरा, इसी कारण से ताई बाई से सम्बन्धित समस्त दस्तावेज, वस्तुओं यहां तक कि जालौन स्थित उनके किले को सन् 1860 में जमींदोज करवा दिया। अंग्रेजी सरकार की इस कायरतापूर्ण कार्यवाही के बाद भी इस वीर महिला की वीरता का वर्णन करते हुए तत्कालीन झांसी डिवीजन के एक अंग्रेज अधिकारी जे0 डब्ल्यू0 पिंकने ने लिखा भी था कि वर्ष 1858 के प्रारम्भ होते-होते दबोह और कछवाघार के कुछ भागों को छोड़ कर पूरा जालौन जिला ताई बाई के अधिकार में आ गया था।
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            उत्तर प्रदेश का जनपद जालौन सन् 1857 के समय आज की स्थिति में नहीं था। सन् 1838 में जालौन पर अंग्रेजों का अस्थाई अधिकार हो गया था। जालौन के राजा की मृत्यु पश्चात यहां उत्तराधिकार की समस्या सामने आई। राजा की पत्नी ने एक बालक गोद लेकर राज्य करने का विचार किया मगर उसकी अनुभवहीनता और आपसी झगड़ों में यहां की स्थिति बिगड़ गई। तब स्वर्गीय राजा बालाराव की पत्नी लक्ष्मीबाई ने अंग्रेजों से जालौन की रियासत को संभालने का आग्रह किया। तत्पश्चात सन् 1838 में यहां प्रशासक नियुक्त कर दिया गया। इसी दौरान सन् 1840 में गोद लिए बालक गोविन्दराव की मृत्यु हो गई। इस बार अंग्रेजों ने रानी को पुनः किसी को गोद लेने की अनुमति नहीं दी और जालौन रियासत को अंग्रेजी राज्य में मिला लिया। इसी वर्ष अंग्रेजों ने जालौन को जिले के रूप में मान्यता प्रदान की। इसके बाद तमाम सारी कार्यवाहियों और गतिविधियों के बाद अंग्रेजों ने सन् 1853 को कालपी तथा कोंच को भी जनपद जालौन में शामिल कर लिया।
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            जनपद जालौन की पहली महिला क्रान्तिकारी ताई बाई जालौन रियासत के स्वर्गीय राजा बालारव की बहिन थीं। ताई बाई का विवाह सागर के नारायण राव से हुआ था परन्तु विवाहोपरान्त ताई बाई अपने पति सहित जालौन के किले में ही निवास करने लगीं। राजा बालाराव की मृत्यु पश्चात उनकी पत्नी रानी लक्ष्मीबाई के द्वारा शासन का संचालन उचित रूप से नहीं हो पा रहा था, इधर परिस्थितियों के विषम होने के कारण जालौन को अंग्रेजों ने अपने अधिकार में भी ले लिया था। ताई बाई अपने पूर्वजों का ऐसा अपमान नहीं देख पा रहीं थीं। अंग्रेजों से बदला लेने के लिए उनके भीतर स्वाधीनता क्रान्ति का अंकुर फूटने लगा इसी कारण उन्होंने गुपचुप तरीके से अपनी योजना को क्रियान्वित करने का विचार बनाया।
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            कानपुर में क्रान्ति की शुरूआत होने की सूचना 6 जून 1857 को उरई पहुंची। इसके पश्चात यहां भी क्रान्तिकारियों ने कार्यवाही प्रारम्भ कर दी। क्रान्ति का आरम्भ होते ही जालौन के डिप्टी कमिश्नर कैप्टन ब्राउन ने भागने में ही अपनी भलाई समझी। कैप्टन ने भागते समय गुरसराय के राजा केशवदास को पत्र लिख कर जालौन में शांति स्थापित करने में सरकारी अधिकारियों की सहायता करने को कहा। राजा केशवदास मौकापरस्त व्यक्ति था, उसने अपने पूरे कार्यकाल में उसी का साथ दिया जिसका पलड़ा भारी होता था। इससे पूर्व वह अंग्रेजों की दया पर ही गुरसराय पर अपना राज्य चला पा रहा था। कैप्टन के पत्र के बाद केशवदास ने जालौन में ताई बाई तथा अन्य क्रान्तिकारियों के तेवर देखे तो उसने ताई बाई का साथ देने में ही अपनी बधाई समझी। कैप्टन के पत्र की भाषा में फेरबदल करके उसे सरकार चलाने के अधिकार-पत्र के रूप में परिवर्तित कर लिया। केशवदास ने अपने दोनों पुत्रों के साथ जालौन आकर अन्य सरकारी अधिकारियों को भगा कर किले पर अधिकार कर लिया। केशवदास के इस कृत्य को ताई बाई आदि ने क्रान्तिकारियों का सहयोग समझकर धन-बल से उसकी सहायता की। इधर ताई बाई अन्य क्रान्तिकारी गतिविधियों का संचालन करने लगीं और राजा केशवदास पर विश्वास कर बैठीं।
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            केशवदास की कुछ गतिविधियों से लगता कि वे क्रान्तिकारियों के पक्ष में हैं तो कभी लगता कि वे अंग्रेजों के पक्ष में हैं। इस बारे में एक घटना को प्रमुखता से देखा जाता है। जालौन में क्रान्ति के पश्चात दो अंग्रेजी डिप्टी कलेक्टर पशन्हा और ग्रिफिथ को बन्दी बना लिया गया था। जब तक कानुपर में नाना साहब, तात्या तोपे क्रान्तिकारी के रूप में और जालौन में ताई बाई की सक्रियता रही तब तक केशवदास ने इन अंग्रेज अधिकारियों को बन्दी बनाये रखा। अंग्रेज नाराज न हो जायें इस कारण से केशवदास ने उन्हें मारा भी नहीं और फिर कानपुर में क्रान्तिकारियों की पराजय के साथ ही केशवदास ने दोनों अंग्रेज अधिकारियों को परिवार सहित सकुशल कानपुर पहुंचा दिया।
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            इस घटना के बाद से ताई बाई को विश्वास हो गया कि केशवदास अंग्रेजों के लिए कुछ भी कर सकता है। इधर पराजित क्रान्तिकारी कानपुर से भागकर कालपी आ गये। तात्या तोपे भी अक्टूबर 1857 को ग्वालियर के विद्रोही सैनिकों के साथ जालौन आ पहुंचे। ताई बाई ने तात्या तोपे के साथ मिलकर केशवदास को वापस गुरसराय जाने पर विवश कर दिया। इस घटना के बाद तात्या ने ताई बाई के पांच वर्षीय पुत्र गोविन्द राव को जालौन की गद्दी पर बिठा कर ताई बाई को संरक्षिका घोषित कर दिया। इस कार्यवाही से जालौन में क्रान्तिकारियों की सरकार का गठन हो गया और पेशवाई राज्य की स्थापना हुई। ताई बाई ने इसके बाद भी अपनी गतिविधियों को विराम नहीं लगने दिया। क्रान्तिकारी गतिविधियों के आगे के संचालन हेतु ताई बाई ने तात्या तोपे को तीन लाख रुपये की सहायता प्रदान की।
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            क्रान्तिकारियों की सरकार बन चुकी थी और ताई बाई ने सफल संचालन के लिए प्रधानमंत्री तथा अन्य अधिकारियों की नियुक्ति की। ताई बाई ने अद्भुत क्षमता से अत्यल्प समय में एक बड़ी सेना का गठन करके उसे तात्या तोपे के साथ कानपुर पर अधिकार करने के लिए भेज दिया। कई हमलों में विजय भी प्राप्त हुई परन्तु पूर्ण अधिकार प्राप्त न हो सका। अन्ततः दिसम्बर में एक युद्ध में इस सेना की भयानक पराजय हुई। यह सेना हताश मन से वापस लौट आई। ताई बाई यह भली-भांति समझती थी कि यदि इस समय हिम्मत हारी तो क्रान्तिकारियों में जोश पैदा करना मुश्किल हो जायेगा। इस कारण से ताई बाई ने अपने व्यक्तिगत जेवरों और कीमती वस्तुओं को बेचकर प्राप्त धन से सेना का पुनः गठन किया।
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            जालौन में क्रान्तिकारियों का स्वतन्त्र राज्य पहले से ही स्थापित था, ताई बाई ने सहयोग के लिए चरखारी नरेश से सहायता मांगी। अंग्रेजों के हितैषी चरखारी नरेश ने सहायता देने से मना किया तो ताई बाई ने तात्या तोपे के नेतृत्व में अपनी सेना के द्वारा चरखारी पर विजय प्राप्त की। अपनी समूची सेना के खर्चों, युद्ध खर्चों, वेतन आदि का भार ताई बाई स्वयं ही उठाती रहीं। अपनी सूझबूझ और कुशल नेतृत्व क्षमता के कारण ताई बाई ने सम्पूर्ण जनपद में अंग्रेजों का नामोनिशान भी न रहने दिया।
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            ताई बाई की बढ़ती शक्ति से अंग्रेज भी परेशान थे। एक ओर क्रान्तिकारी घटनाएं हो रही थीं और रानी लक्ष्मीबाई, नाना साहब आदि की गतिविधियों के साथ-साथ ताई बाई का शासन अंग्रेजों को रास नहीं आ रहा था। इस समय तक कालपी क्रान्तिकारी घटनाओं के संचालन का केन्द्र बन चुका था। मई 1858 में कोंच के युद्ध में क्रान्तिकारियों की पराजय से अंग्रेजों को जनपद में पुनः घुसने का मौका मिला। कोंच में अंग्रेजों की विजय उनकी कूटनीति के कारण नहीं अपितु सैनिकों की अनुशासनहीनता के कारण हुई। इस पराजय के बाद तात्या तोपे वापस आने के स्थान पर ग्वालियर चले गये। इधर ताई बाई असमंजस में थी और अंग्रेज भी जालौन के स्थान पर कालपी किले पर कब्जा करना चाह रहे थे। इसका कारण एक तो वे क्रान्तिकारियों की शक्ति को सीधे तौर पर कम करना चाहते थे और दूसरी ओर ताई बाई के साथ संघर्ष में अंग्रेज अपनी शक्ति को कम नहीं करना चाहते थे।
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            कोंच में विध्वंस करने के बाद अंग्रेजों ने सीधे कालपी की ओर रुख नहीं किया और न ही सीधे तौर पर ताई बाई से युद्ध किया। अंग्रेजों ने नई कूटनीति का इस्तेमाल करते हुए ताई बाई के सहयोगियों को मिटाना शुरू कर दिया। इसके लिए उन्होंने युद्ध का नहीं वरन् नरसंहार का सहारा लिया। सबसे पहले हरदोई के जमींदार अंग्रेजी सेना के कोपभाजन बने। भयंकर लूटपाट और नरसंहार किया, एक दर्जन से अधिक क्रान्तिकारियों को खुलेआम पेड़ से लटका कर फांसी की सजा दे दी गई। अंग्रेजों का नरसंहार जारी रहा, अब वे ताई बाई से सीधे न टकराकर जनता को निशाना बना रहे थे। ताई बाई ने नरसंहार को रोकने का उपाय भी किया किन्तु अंग्रेज सीधे-सीधे युद्ध भी नहीं कर रहे थे इस कारण ताई बाई के समक्ष दिक्कत भी आ रही थी।
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            अन्ततः ताई बाई ने नरसंहार रोकने के लिए मई 1858 को अपने पति और पुत्र के साथ आत्मसमर्पण कर दिया।  अंग्रेजों ने ताई बाई की जालौन की समस्त सम्पत्ति जब्त कर ली। राजद्रोह और विद्रोह का आरोप लगाकर उन्हें तथा उनके सहयोगियों को आजीवन कारावास की सजा सुना दी। ताई बाई की लोकप्रियता और शक्ति से घबराकर अंग्रेजों ने उन्हें बंदी जीवन बिताने के लिए जालौन से बहुत दूर मुंगेर-बिहार- भेज दिया गया। यहीं पर कैदी जीवन बिताते हुए उनकी मृत्यु सन् 1870 में हो गई। ताई बाई की मृत्यु के बाद भी अंग्रेज उनकी लोकप्रियता और शक्ति से घबराते रहे। इसका प्रमाण इस बात से मिलता है कि उनकी मृत्यु के बाद उनके कैदी बेटे को पढ़ने के लिए तो इलाहाबाद भेज दिया गया किन्तु उनके बंदी पति को जालौन में रहने की आज्ञा नहीं दी गई।
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            वर्तमान में ताई बाई को अंग्रेजी कोप के कारण कोई जानता भी नहीं है। एक छोटे से स्थान पर उन्होंने अपनी कार्यक्षमता और कुशल सैन्य संचालन से अक्टूबर 57 से मई 58 तक स्वतन्त्र सरकार की स्थापना कर उसका संचालन किया। जनपद जालौन की इस क्रान्तिकारी महिला को लोग इस कारण से भी नहीं पहचानते हैं कि अंग्रेजों ने यथासम्भव जालौन से ताई बाई से सम्बन्धित सभी वस्तुओं, दस्तावेजों आदि को समूल नष्ट कर दिया था। इसके बाद भी उनकी छवि, लोकप्रियता भले ही रानी लक्ष्मीबाई जैसी न रही हो किन्तु जनपद जालौन के निवासियों के मन-मष्तिष्क में ताई बाई की छवि आज भी बसी हुई है। अंग्रेजों द्वारा लिखे गये क्रान्तिकारियों के भ्रामक इतिहास को पुनः लिखने और सामने लाने की आवश्यकता है, कुछ इसी तरह की पहल की आवश्यकता ताई बाई के गौरवशाली इतिहास को सामने लाने की है। जनपद जालौन की पहली महिला क्रान्तिकारी ताई बाई को इन्हीं समवेत प्रयासों के माध्यम से ही देशवासियों के सामने लाया जा सकता है, तभी हम सभी अन्य वीर-वीरांगनाओं की तरह ही ताई बाई को भी याद रख सकेंगे।
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16/06/2008

बुन्देली लोकोत्सव : कजली

विन्ध्य पर्वत श्रणियों के बीच बसे, सुरम्य सरोवरों से रचे-बसे, नैसर्गिक सुन्दरता से निखरे बुन्देलखण्ड में ऐतिहासिकता, संस्कृति, लोक-तत्त्व, शौर्य-ओज, आन-बाण-शान की अद्भुत छटा के दर्शन होते ही रहते हैं. यहाँ की लोक-परम्परा में कजली का अपना ही विशेष महत्त्व है. महोबा के राजा परमाल के शासन में आल्हा-ऊदल के शौर्य-पराक्रम के साथ-साथ अन्य बुन्देली रण-बाँकुरों की विजय की स्मृतियों को संजोये रखने के लिए कजली मेले का आयोजन आठ सौ से अधिक वर्षों से निरंतर होता आ रहा है. किसी समय में बुन्देलखण्ड में कजली लोक-पर्व को खेती-किसानी से सम्बद्ध करके देखा जाता था. जब यहाँ के गर्म-तप्त खेतों को सावन की फुहारों से ठंडक मिल जाती थी तो किसान वर्ग अपने आपको खेती के लिए तैयार करने लगता था. सावन के महीने की नौवीं से ही इसका अनुष्ठान शुरू हो जाता था. घर-परिवार की महिलाएँ खेतों से मिट्टी लाकर उसे छौले के दोने (पत्तों का बना पात्र) में भरकर उसमें गेंहू, जौ आदि को बो देती थी. नित्य उसमें पानी-दूध को चढ़ाकर उसका पूजन किया जाता था, इसके पीछे उन्नत कृषि, उन्नत उपज होने की कामना छिपी रहती थी. सावन की पूर्णिमा को इन पात्रों (दोने) में बोये गए बीजों के नन्हें अंकुरण (कजली) को निकालकर दोनों को तालाब में विसर्जन किया जाता था. बाद में इन्हीं कजलियों का आपस में आदरपूर्वक आदान-प्रदान करके एक दूसरे को शुभकामनायें देते हुए उन्नत उपज की कामना भी की जाती थी. ये परम्परा आज भी चली आ रही है, बस इसमें शौर्य-गाथा के जुड़ जाने से आज इसका विशेष महत्त्व हो गया है.
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महोबा के राजा परमाल की पुत्री चंद्रावलि अपनी हजारों सहेलियों और महोबा की अन्य दूसरी महिलाओं के साथ प्रतिवर्ष कीरत सागर तालाब में कजलियों को सिराने (विसर्जन करने) जाया करती थी. सन ११८२ में दिल्ली के राजा पृथ्वीराज चौहान ने राजकुमारी के अपहरण की योजना बनाई और तय किया गया कि कजलियों के विसर्जन के समय ही आक्रमण करके राजकुमारी का अपहरण कर लिया जाये. पृथ्वीराज चौहान को भली-भांति ज्ञात था कि महोबा के पराक्रमी आल्हा और ऊदल एक साजिश का शिकार होकर महोबा से निकाले जा चुके हैं और महोबा को उनकी कमी में जीतना आसान होगा. अपनी विजय को सुनिश्चित करने और राजकुमारी के अपहरण के लिए उसके सेनापति चामुंडा राय और पृथ्वीराज चौहान के पुत्र सूरज सिंह ने महोबा को घेर लिया. उस समय महोबा शासन के वीर-बाँकुरे आल्हा और ऊदल कन्नौज में थे. रानी मल्हना ने उनको महोबा की रक्षा करने के लिए तुरंत वापस आने का सन्देश भिजवाया. सूचना मिलते ही आल्हा-ऊदल अपने चचेरे भाई मलखान के साथ महोबा पहुँच गए. परमाल के पुत्र रंजीत के नेतृत्व में पृथ्वीराज की सेना पर आक्रमण कर दिया गया. इस युद्ध की सूचना मिलते ही राजकुमारी चंद्रावलि का ममेरा भाई अभई (रानी मल्हना के भाई माहिल का पुत्र) उरई से अपने बहादुर साथियों के साथ महोबा पहुँच गया.
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लगभग २४ घंटे चले इस भीषण युद्ध में आल्हा-ऊदल के अद्भुत पराक्रम, वीर अभई के शौर्य के चलते पृथ्वीराज चौहान की सेना को पराजय का मुंह देखना पड़ा. सेना रणभूमि से भाग गई, इस युद्ध में पृथ्वीराज चौहान का पुत्र सूरज सिंह भी मारा गया. इसके अलावा राजा परमाल का पुत्र रंजीत सिंह और वीर अभई भी वीरगति को प्राप्त हुए. ऐसी किंवदंती है कि वीर अभई सिर कटने के बाद भी कई घंटों युद्ध लड़ता रहा था.
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ऐतिहासिक विजय को प्राप्त करने के बाद राजकुमारी चंद्रावलि और उसकी सहेलियों के साथ-साथ राजा परमाल की पत्नी रानी मल्हना ने, महोबा की अन्य महिलाओं ने भी भुजरियों (कजली) का विसर्जन किया. इसी के बाद पूरे महोबा में रक्षाबंधन का पर्व धूमधाम से मनाया गया. तब से ऐसी परम्परा चली आ रही है कि बुन्देलखण्ड में रक्षाबंधन का पर्व भुजरियों का विसर्जन करने के बाद ही मनाया जाता है. वीर बुंदेलों के शौर्य को याद रखने के लिए ही कहीं-कहीं सात दिनों तक कजली का मेला आयोजित किया जाता है. यहाँ के लोग आल्हा-ऊदल के शौर्य-पराक्रम को नमन करते हुए बुन्देलखण्ड के वीर रण-बाँकुरों को याद करते हैं.

11/06/2008

बुन्देलखण्ड के लोक-देवता

पिछली पोस्ट में बुंदेलखंड के लोक-देवता की चर्चा आपके साथ की थी। उसमें लोक-देवताओं में लाला हरदौल लोक-देवता की चर्चा हुई थी। आज आपके साथ बुंदेलखंड के लोक-देवता के रूप में प्रतिष्ठित "मैकासुर" तथा "कारसदेव" के साथ-साथ अन्य ग्राम-देवताओं के बारे में आपको बताने का प्रयास होगा।

मैकासुर

मैकासुर को बुंदेलखंड क्षेत्र में पशु-रक्षक देवता के रूप में मान्यता प्राप्त है। इसी रूप में उनकी पूजा भी की जाती है। यद्यपि इनके बारे में किसी प्रकार का एतिहासिक वर्णन प्राप्त नहीं होता है पर फ़िर भी प्रत्येक माह की शुक्ल पक्ष की चतुर्थी को इनकी पूजा की जाती है। इस पूजा में विशेष रूप से मैकासुर से पशुओं की रक्षा करने की प्रार्थना की जाती है। इनके पूजा का स्थान एक चबूतरे पर ऊँचे से टीले पर कंगूरेदार होता है, जहाँ पूजा के समय प्रसाद तथा सफ़ेद रंग की ध्वजा(झंडा) चढाई जाती है। इनके प्रसाद को लेकर मान्यता है कि उसे वहीं समाप्त करना होता है, प्रसाद को घर ले जाने को भी नहीं मिलता है। मान्यता है कि मैकासुर के पूजन के बाद लोगों के जानवर, पशु सुरक्षित रहते हैं।

कारस-देव

कारस-देव की पूजा पशु-रक्षा के साथ-साथ झाड़-फूंक के लिए भी की जाती है। मैकासुर की तरह ही इनका भी पूजा का स्थान ऊँचे से टीले पर बना होता है। कारस-देव को एतिहासिक व्यक्तित्व मन गया है। ये हैहय वंशी राजाओं की परम्परा के स्वीकारे गए हैं। इनकी पूजा के समय भी प्रसाद को वहीं पर समाप्त करने का विधान है, प्रसाद को घर नहीं ले जाया जाता है। इनके प्रसाद में सफ़ेद ध्वजा, नारियल आदि चढाने का चलन है। इनकी पूजा के समय इनके नाम का दरवार लगता है, जिसमें लोग अपनी समस्या को सामने रखते हैं। एक व्यक्ति जिसे मन जाता है कि उस पर कारस-देव का प्रभाव आ जाता है वह भक्तों की समस्याओं को सुनता है तथा झाड़-फूंक के साथ उनका निदान भी करता है।

इन दोनों लोक-देवताओं के बारे में एक बात खास है कि होली के अवसर पर अहीर जाति के लोग इन दोनों लोक-देवताओं के समक्ष नृत्य करते हैं।

अन्य ग्राम-देवता

लोक-देवताओं के अतिरिक्त बुंदेलखंड में गाँव में कुछ प्रतीक ऐसे भी हैं जिन्हें धार्मिक रूप से ग्राम-देवताओं के रूप में मान्यता प्राप्त है। इनमें कुछ प्रतीकों को जातिगत रूप से मान्यता प्राप्त है पर उनकी पूजा-आराधना करने में किसी भी जाति विशेष को अधिकार प्राप्त नहीं है। इनमें घतोइया बाबा प्रमुख हैं।

घतोइया बाबा

घतोइया बाबा को वरुण देवता के रूप में मान्यता प्राप्त है। इनके भी चबूतरे पाए जाते हैं जो विशेष रूप से नदियों अथवा तालाबों के किनारे पाए जाते हैं। नदी- नाले पार करते समय विशेष रूप से इनका स्मरण किया जाता है। जल से सम्बन्धी काम करने वाली जातियाँ अथवा लोग इनकी पूजा विशेष रूप से करते हैं। इनमें मछुआरे, धोबी, ढीमर आदि आते हैं। इसके अतिरिक्त बारात जाते समय, किसी शुभ काम से निकलते समय नदी-नाले पार करते समय इनकी पूजा अथवा स्मरण सभी जातियों के लोग करते हैं। इनके प्रसाद में नारियल चढाने का चलन है।

इनके अतिरिक्त भी अनेक प्रतीकों को ग्राम-देवता के रूप में मान्यता प्राप्त है। ग्राम-देवता अपने-अपने ग्रामों के सीमित क्षेत्र में पूज्य हैं तथा ग्रामों के अनुसार अपने-अपने ग्राम-देवता भी स्थापित हैं।

बुंदेलखंड की संस्कृति अद्भुत एवं विविधताओं से भरी है। इसमें हर पल में अनेक-अनेक रंग भरे हैं। अभी इतना ही, समय-समय पर और बहुत कुछ आपके लिए सामने लाते रहेंगे।

02/06/2008

लाला हरदौल लोक-देवता

बुन्देलखण्ड में लोक-देवताओं, ग्राम-देवताओं के प्रति लोगों में बड़ी ही श्रद्धा है। किसी भी व्यक्ति के शौर्य, चमत्कार से प्रभावित होकर लोग उसे देवता की श्रेणी में शामिल कर देते हैं। बुन्देलखण्ड में लोक-देवताओं के अतिरिक्त ग्राम-देवताओं की भी पूजा की जाती है। लोक-देवताओं की श्रेणी में वे देवता शामिल किए जाते हैं जिनकी पूजा सभी गाँव में होती है, जबकि ग्राम-देवता अपने ग्राम विशेष तक सीमित रहते हैं। लोक-देवताओं की पूजा के लिए गाँव-गाँव में उनके नाम के चबूतरे बने होते हैं, जबकि ग्राम देवताओं को अन्य गाँव में भी पूजा जाए ऐसा आवश्यक नहीं।


बुन्देलखण्ड में लाला हरदौल, दूला देव, मैकासुर, कारसदेव, कोरी बाबा, खाती बाबा, घतोइया बाबा, मेडिया बाबा आदि को लोक-देवता, ग्राम-देवता का स्थान प्राप्त है। इनमें लोक-देवता के रूप में लाला हरदौल को विशेष मान्यता है। लोक-देवताओं में यहाँ लाला हरदौल के बारे में जानकारी देते हुए क्रमशः आगे बढ़ा जाएगा।


लाला हरदौल


लाला हरदौल बुन्देलखण्ड के सर्वाधिक मान्य लोक-देवता हैं। प्रत्येक गाँव में इनके नाम के चबूतरे बने हैं। यही चबूतरे इनकी पूजा के स्थान माने जाते हैं। इन चबूतरों पर किसी भी तरह की प्रतिमा या मूर्ति नहीं होती है। लाला हरदौल की पूजा का वैसे कोई विशेष अवसर नही है किंतु शादी-विवाह के शुभ अवसर पर लाला हरदौल को याद किए बिना कार्यक्रम संपन्न नहीं किए जाते। घर की महिलाओं के साथ घर की बुजुर्ग महिला लाल के चबूतरे पर जाकर पूजा करती हैं साथ ही लाला हरदौल को विवाह में आने का निमंत्रण देती हैं। लोकगीतों के साथ संपन्न होते इस पूजा-निमंत्रण कार्यक्रम में मांगलिक कार्य के आसानी से निपट जाने की भी कामना की जाती है।


इस प्रकार की प्रथा के चलन के पीछे लाला हरदौल से जुडी एक कथा प्रचिलित है। लाला हरदौल ओरछा राजवंश के राजा जुझार सिंह के छोटे भाई थे। जुझार सिंह के कोई संतान नही थी तथा उम्र में काफी छोटे होने के कारन लाला हरदौल को अपने भाई जुझार सिंह तथा अपनी भाभी का अपार स्नेह प्राप्त होता था। दोनों भाइयों के अपार स्नेह को देख कर उनसे ईर्ष्या, जलन रखने वालों ने जुझार सिंह को लाला हरदौल तथा रानी के रिश्तों को लेकर भरना शुरू कर दिया। हरदौल का महल में बने रहना, रानी का लाला के प्रति अपार स्नेह संदेह का कारन भी बँटा गया।


शुरू में जुझार सिंह द्वारा इसको टालने का प्रयास किया किंतु एक ही बात लगातार उनको बताई जाती रही जिससे उनके मन में संदेह ने विकराल रूप ले लिया। इससे संदेह की आग में अंधे होकर जुझार सिंह ने अपनी रानी को आदेश दिया की वो भोजन में विष मिला कर लाला हरदौल को खिला दे।


रानी चिंता में पड़ गई, एक तरफ़ पतिव्रत धर्म तथा दूसरी तरफ़ पुत्रवत हरदौल। उसकी समझ में नही आ रहा था की वो क्या करे? रानी ने हरदौल की जान बचने के लिए हरदौल को उनके भाई का आदेश भी बता दिया। हरदौल ने बिना किसी घबराहट के माँ समान भाभी की लाज रखने की खातिर हँसते-हँसते विष से भरा भोजन कर लिया।


लाला हरदौल अमर हो गए। कहा जाता है की लाला के मरने के बाद हरदौल से स्नेह रखने वाले उनके घोडे ने भी अपने प्राण त्याग दिए। लाला हरदौल के अमर होकर लोक-देवता बनने के पीछे इतनी सी कहानी नहीं है। कहा जाता है की लाला हरदौल के निधन के बाद उसकी बहिन कुंजवती की पुत्री का विवाह होना था। अपने बड़े भाई जुझार सिंह को वह पहले ही भला-बुरा कह चुकी थी। इस वजह से जुझार सिंह से वो शादी में भात मँगाने की रस्म को नहीं आई। कुंजावाती रोते-रोते लाला हरदौल की समाधि पर गई तथा भांजी की शादी में आने का निमंत्रण दे कर आई।


ऐसी किम्वदन्ती है की उस शादी में लाला हरदौल की छाया हमेशा रही तथा विवाह की सारी रस्मों में किसी न किसी रूप में लाला की उपस्थिति बनी

तभी से एक पावन मान्यता से लाला हरदौल को लोक-देवता के रूप में पूजा जाने लगा।

17/05/2008

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