16/06/2008

बुन्देली लोकोत्सव : कजली

विन्ध्य पर्वत श्रणियों के बीच बसे, सुरम्य सरोवरों से रचे-बसे, नैसर्गिक सुन्दरता से निखरे बुन्देलखण्ड में ऐतिहासिकता, संस्कृति, लोक-तत्त्व, शौर्य-ओज, आन-बाण-शान की अद्भुत छटा के दर्शन होते ही रहते हैं. यहाँ की लोक-परम्परा में कजली का अपना ही विशेष महत्त्व है. महोबा के राजा परमाल के शासन में आल्हा-ऊदल के शौर्य-पराक्रम के साथ-साथ अन्य बुन्देली रण-बाँकुरों की विजय की स्मृतियों को संजोये रखने के लिए कजली मेले का आयोजन आठ सौ से अधिक वर्षों से निरंतर होता आ रहा है. किसी समय में बुन्देलखण्ड में कजली लोक-पर्व को खेती-किसानी से सम्बद्ध करके देखा जाता था. जब यहाँ के गर्म-तप्त खेतों को सावन की फुहारों से ठंडक मिल जाती थी तो किसान वर्ग अपने आपको खेती के लिए तैयार करने लगता था. सावन के महीने की नौवीं से ही इसका अनुष्ठान शुरू हो जाता था. घर-परिवार की महिलाएँ खेतों से मिट्टी लाकर उसे छौले के दोने (पत्तों का बना पात्र) में भरकर उसमें गेंहू, जौ आदि को बो देती थी. नित्य उसमें पानी-दूध को चढ़ाकर उसका पूजन किया जाता था, इसके पीछे उन्नत कृषि, उन्नत उपज होने की कामना छिपी रहती थी. सावन की पूर्णिमा को इन पात्रों (दोने) में बोये गए बीजों के नन्हें अंकुरण (कजली) को निकालकर दोनों को तालाब में विसर्जन किया जाता था. बाद में इन्हीं कजलियों का आपस में आदरपूर्वक आदान-प्रदान करके एक दूसरे को शुभकामनायें देते हुए उन्नत उपज की कामना भी की जाती थी. ये परम्परा आज भी चली आ रही है, बस इसमें शौर्य-गाथा के जुड़ जाने से आज इसका विशेष महत्त्व हो गया है.
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महोबा के राजा परमाल की पुत्री चंद्रावलि अपनी हजारों सहेलियों और महोबा की अन्य दूसरी महिलाओं के साथ प्रतिवर्ष कीरत सागर तालाब में कजलियों को सिराने (विसर्जन करने) जाया करती थी. सन ११८२ में दिल्ली के राजा पृथ्वीराज चौहान ने राजकुमारी के अपहरण की योजना बनाई और तय किया गया कि कजलियों के विसर्जन के समय ही आक्रमण करके राजकुमारी का अपहरण कर लिया जाये. पृथ्वीराज चौहान को भली-भांति ज्ञात था कि महोबा के पराक्रमी आल्हा और ऊदल एक साजिश का शिकार होकर महोबा से निकाले जा चुके हैं और महोबा को उनकी कमी में जीतना आसान होगा. अपनी विजय को सुनिश्चित करने और राजकुमारी के अपहरण के लिए उसके सेनापति चामुंडा राय और पृथ्वीराज चौहान के पुत्र सूरज सिंह ने महोबा को घेर लिया. उस समय महोबा शासन के वीर-बाँकुरे आल्हा और ऊदल कन्नौज में थे. रानी मल्हना ने उनको महोबा की रक्षा करने के लिए तुरंत वापस आने का सन्देश भिजवाया. सूचना मिलते ही आल्हा-ऊदल अपने चचेरे भाई मलखान के साथ महोबा पहुँच गए. परमाल के पुत्र रंजीत के नेतृत्व में पृथ्वीराज की सेना पर आक्रमण कर दिया गया. इस युद्ध की सूचना मिलते ही राजकुमारी चंद्रावलि का ममेरा भाई अभई (रानी मल्हना के भाई माहिल का पुत्र) उरई से अपने बहादुर साथियों के साथ महोबा पहुँच गया.
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लगभग २४ घंटे चले इस भीषण युद्ध में आल्हा-ऊदल के अद्भुत पराक्रम, वीर अभई के शौर्य के चलते पृथ्वीराज चौहान की सेना को पराजय का मुंह देखना पड़ा. सेना रणभूमि से भाग गई, इस युद्ध में पृथ्वीराज चौहान का पुत्र सूरज सिंह भी मारा गया. इसके अलावा राजा परमाल का पुत्र रंजीत सिंह और वीर अभई भी वीरगति को प्राप्त हुए. ऐसी किंवदंती है कि वीर अभई सिर कटने के बाद भी कई घंटों युद्ध लड़ता रहा था.
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ऐतिहासिक विजय को प्राप्त करने के बाद राजकुमारी चंद्रावलि और उसकी सहेलियों के साथ-साथ राजा परमाल की पत्नी रानी मल्हना ने, महोबा की अन्य महिलाओं ने भी भुजरियों (कजली) का विसर्जन किया. इसी के बाद पूरे महोबा में रक्षाबंधन का पर्व धूमधाम से मनाया गया. तब से ऐसी परम्परा चली आ रही है कि बुन्देलखण्ड में रक्षाबंधन का पर्व भुजरियों का विसर्जन करने के बाद ही मनाया जाता है. वीर बुंदेलों के शौर्य को याद रखने के लिए ही कहीं-कहीं सात दिनों तक कजली का मेला आयोजित किया जाता है. यहाँ के लोग आल्हा-ऊदल के शौर्य-पराक्रम को नमन करते हुए बुन्देलखण्ड के वीर रण-बाँकुरों को याद करते हैं.

11/06/2008

बुन्देलखण्ड के लोक-देवता

पिछली पोस्ट में बुंदेलखंड के लोक-देवता की चर्चा आपके साथ की थी। उसमें लोक-देवताओं में लाला हरदौल लोक-देवता की चर्चा हुई थी। आज आपके साथ बुंदेलखंड के लोक-देवता के रूप में प्रतिष्ठित "मैकासुर" तथा "कारसदेव" के साथ-साथ अन्य ग्राम-देवताओं के बारे में आपको बताने का प्रयास होगा।

मैकासुर

मैकासुर को बुंदेलखंड क्षेत्र में पशु-रक्षक देवता के रूप में मान्यता प्राप्त है। इसी रूप में उनकी पूजा भी की जाती है। यद्यपि इनके बारे में किसी प्रकार का एतिहासिक वर्णन प्राप्त नहीं होता है पर फ़िर भी प्रत्येक माह की शुक्ल पक्ष की चतुर्थी को इनकी पूजा की जाती है। इस पूजा में विशेष रूप से मैकासुर से पशुओं की रक्षा करने की प्रार्थना की जाती है। इनके पूजा का स्थान एक चबूतरे पर ऊँचे से टीले पर कंगूरेदार होता है, जहाँ पूजा के समय प्रसाद तथा सफ़ेद रंग की ध्वजा(झंडा) चढाई जाती है। इनके प्रसाद को लेकर मान्यता है कि उसे वहीं समाप्त करना होता है, प्रसाद को घर ले जाने को भी नहीं मिलता है। मान्यता है कि मैकासुर के पूजन के बाद लोगों के जानवर, पशु सुरक्षित रहते हैं।

कारस-देव

कारस-देव की पूजा पशु-रक्षा के साथ-साथ झाड़-फूंक के लिए भी की जाती है। मैकासुर की तरह ही इनका भी पूजा का स्थान ऊँचे से टीले पर बना होता है। कारस-देव को एतिहासिक व्यक्तित्व मन गया है। ये हैहय वंशी राजाओं की परम्परा के स्वीकारे गए हैं। इनकी पूजा के समय भी प्रसाद को वहीं पर समाप्त करने का विधान है, प्रसाद को घर नहीं ले जाया जाता है। इनके प्रसाद में सफ़ेद ध्वजा, नारियल आदि चढाने का चलन है। इनकी पूजा के समय इनके नाम का दरवार लगता है, जिसमें लोग अपनी समस्या को सामने रखते हैं। एक व्यक्ति जिसे मन जाता है कि उस पर कारस-देव का प्रभाव आ जाता है वह भक्तों की समस्याओं को सुनता है तथा झाड़-फूंक के साथ उनका निदान भी करता है।

इन दोनों लोक-देवताओं के बारे में एक बात खास है कि होली के अवसर पर अहीर जाति के लोग इन दोनों लोक-देवताओं के समक्ष नृत्य करते हैं।

अन्य ग्राम-देवता

लोक-देवताओं के अतिरिक्त बुंदेलखंड में गाँव में कुछ प्रतीक ऐसे भी हैं जिन्हें धार्मिक रूप से ग्राम-देवताओं के रूप में मान्यता प्राप्त है। इनमें कुछ प्रतीकों को जातिगत रूप से मान्यता प्राप्त है पर उनकी पूजा-आराधना करने में किसी भी जाति विशेष को अधिकार प्राप्त नहीं है। इनमें घतोइया बाबा प्रमुख हैं।

घतोइया बाबा

घतोइया बाबा को वरुण देवता के रूप में मान्यता प्राप्त है। इनके भी चबूतरे पाए जाते हैं जो विशेष रूप से नदियों अथवा तालाबों के किनारे पाए जाते हैं। नदी- नाले पार करते समय विशेष रूप से इनका स्मरण किया जाता है। जल से सम्बन्धी काम करने वाली जातियाँ अथवा लोग इनकी पूजा विशेष रूप से करते हैं। इनमें मछुआरे, धोबी, ढीमर आदि आते हैं। इसके अतिरिक्त बारात जाते समय, किसी शुभ काम से निकलते समय नदी-नाले पार करते समय इनकी पूजा अथवा स्मरण सभी जातियों के लोग करते हैं। इनके प्रसाद में नारियल चढाने का चलन है।

इनके अतिरिक्त भी अनेक प्रतीकों को ग्राम-देवता के रूप में मान्यता प्राप्त है। ग्राम-देवता अपने-अपने ग्रामों के सीमित क्षेत्र में पूज्य हैं तथा ग्रामों के अनुसार अपने-अपने ग्राम-देवता भी स्थापित हैं।

बुंदेलखंड की संस्कृति अद्भुत एवं विविधताओं से भरी है। इसमें हर पल में अनेक-अनेक रंग भरे हैं। अभी इतना ही, समय-समय पर और बहुत कुछ आपके लिए सामने लाते रहेंगे।

02/06/2008

लाला हरदौल लोक-देवता

बुन्देलखण्ड में लोक-देवताओं, ग्राम-देवताओं के प्रति लोगों में बड़ी ही श्रद्धा है। किसी भी व्यक्ति के शौर्य, चमत्कार से प्रभावित होकर लोग उसे देवता की श्रेणी में शामिल कर देते हैं। बुन्देलखण्ड में लोक-देवताओं के अतिरिक्त ग्राम-देवताओं की भी पूजा की जाती है। लोक-देवताओं की श्रेणी में वे देवता शामिल किए जाते हैं जिनकी पूजा सभी गाँव में होती है, जबकि ग्राम-देवता अपने ग्राम विशेष तक सीमित रहते हैं। लोक-देवताओं की पूजा के लिए गाँव-गाँव में उनके नाम के चबूतरे बने होते हैं, जबकि ग्राम देवताओं को अन्य गाँव में भी पूजा जाए ऐसा आवश्यक नहीं।


बुन्देलखण्ड में लाला हरदौल, दूला देव, मैकासुर, कारसदेव, कोरी बाबा, खाती बाबा, घतोइया बाबा, मेडिया बाबा आदि को लोक-देवता, ग्राम-देवता का स्थान प्राप्त है। इनमें लोक-देवता के रूप में लाला हरदौल को विशेष मान्यता है। लोक-देवताओं में यहाँ लाला हरदौल के बारे में जानकारी देते हुए क्रमशः आगे बढ़ा जाएगा।


लाला हरदौल


लाला हरदौल बुन्देलखण्ड के सर्वाधिक मान्य लोक-देवता हैं। प्रत्येक गाँव में इनके नाम के चबूतरे बने हैं। यही चबूतरे इनकी पूजा के स्थान माने जाते हैं। इन चबूतरों पर किसी भी तरह की प्रतिमा या मूर्ति नहीं होती है। लाला हरदौल की पूजा का वैसे कोई विशेष अवसर नही है किंतु शादी-विवाह के शुभ अवसर पर लाला हरदौल को याद किए बिना कार्यक्रम संपन्न नहीं किए जाते। घर की महिलाओं के साथ घर की बुजुर्ग महिला लाल के चबूतरे पर जाकर पूजा करती हैं साथ ही लाला हरदौल को विवाह में आने का निमंत्रण देती हैं। लोकगीतों के साथ संपन्न होते इस पूजा-निमंत्रण कार्यक्रम में मांगलिक कार्य के आसानी से निपट जाने की भी कामना की जाती है।


इस प्रकार की प्रथा के चलन के पीछे लाला हरदौल से जुडी एक कथा प्रचिलित है। लाला हरदौल ओरछा राजवंश के राजा जुझार सिंह के छोटे भाई थे। जुझार सिंह के कोई संतान नही थी तथा उम्र में काफी छोटे होने के कारन लाला हरदौल को अपने भाई जुझार सिंह तथा अपनी भाभी का अपार स्नेह प्राप्त होता था। दोनों भाइयों के अपार स्नेह को देख कर उनसे ईर्ष्या, जलन रखने वालों ने जुझार सिंह को लाला हरदौल तथा रानी के रिश्तों को लेकर भरना शुरू कर दिया। हरदौल का महल में बने रहना, रानी का लाला के प्रति अपार स्नेह संदेह का कारन भी बँटा गया।


शुरू में जुझार सिंह द्वारा इसको टालने का प्रयास किया किंतु एक ही बात लगातार उनको बताई जाती रही जिससे उनके मन में संदेह ने विकराल रूप ले लिया। इससे संदेह की आग में अंधे होकर जुझार सिंह ने अपनी रानी को आदेश दिया की वो भोजन में विष मिला कर लाला हरदौल को खिला दे।


रानी चिंता में पड़ गई, एक तरफ़ पतिव्रत धर्म तथा दूसरी तरफ़ पुत्रवत हरदौल। उसकी समझ में नही आ रहा था की वो क्या करे? रानी ने हरदौल की जान बचने के लिए हरदौल को उनके भाई का आदेश भी बता दिया। हरदौल ने बिना किसी घबराहट के माँ समान भाभी की लाज रखने की खातिर हँसते-हँसते विष से भरा भोजन कर लिया।


लाला हरदौल अमर हो गए। कहा जाता है की लाला के मरने के बाद हरदौल से स्नेह रखने वाले उनके घोडे ने भी अपने प्राण त्याग दिए। लाला हरदौल के अमर होकर लोक-देवता बनने के पीछे इतनी सी कहानी नहीं है। कहा जाता है की लाला हरदौल के निधन के बाद उसकी बहिन कुंजवती की पुत्री का विवाह होना था। अपने बड़े भाई जुझार सिंह को वह पहले ही भला-बुरा कह चुकी थी। इस वजह से जुझार सिंह से वो शादी में भात मँगाने की रस्म को नहीं आई। कुंजावाती रोते-रोते लाला हरदौल की समाधि पर गई तथा भांजी की शादी में आने का निमंत्रण दे कर आई।


ऐसी किम्वदन्ती है की उस शादी में लाला हरदौल की छाया हमेशा रही तथा विवाह की सारी रस्मों में किसी न किसी रूप में लाला की उपस्थिति बनी

तभी से एक पावन मान्यता से लाला हरदौल को लोक-देवता के रूप में पूजा जाने लगा।