30/12/2014

फिजूल की नक़ल करबो कर देओ बंद



फिजूल की नक़ल करबो कर देओ बंद
डॉ० कुमारेन्द्र सिंह सेंगर
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जा बहुतई बड़ी बिडम्बना कही जैहे के जोन बुन्देलखण्ड कभऊँ वीरन से खाली नईं रही, जिते पे दूसरे की रच्छा के लाने जान देबो गरब की बात समझी जात हती, जिते दुसमन की मुड़ी काट लेबो हँसी-मजाक जैसो रहत हतो उते के किसान भैया आत्महत्या अब जैसे कदमन को उठान लगे हैं. आये दिना अब सुनबे को मिलन लगो है कि कभऊँ कौनऊ किसान ने फांसी को फंदा लगा लओ, कभऊँ कितऊँ और के किसान भैया ने आत्महत्या कर लई. जा बहुतई ख़राब हालत दिख रई है और जाके पीछे के कारन ढूंडबे को काम कोऊ नईं कर रओ है. गाओं-दिहात के लोग सरकार को दोस लगान लगत हैं और सरकार किसान भैयन को दोसी बताउत है. ऐसोई होत रैहे तो कौन कछू लाभ निकरहै. सबसे पहलूँ तो हम सबई जनन को मिल बैठ के काम करबे की, मेलजोल बढ़ाबे की जरूरत है. इतै कछुएक समय से देखबे को मिल रओ है के अपएं सिगरे गाओं-दिहात एकदम से सहर बनत जा रए हैं. इतै के लोग पढ़-लिख के सहर की तरह भगन में लगे हैं और जो कछु थोड़े-बहुत गाओंन में रह रए हैं बेऊ सहर बालिन जैसो ब्योहार करन लगे हैं. आपस में मिल-बैठ के कोऊ बात करबो नईं चाहत है, एक-दूसरे की राम-जुहार भये कहो महीनन निकर जाए, एक-दूसरे के सुख-दुःख को कौनऊ ख्यालई नईयाँ. ऐसो थोड़ेई होत रहो हतो गाओंन में और ऐसोई होबो अच्छी बात नईयाँ. 
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नेक जापे बिचार करियो के कौनऊ किसान भैया पे संकट आ गओ है, कौनऊ मुस्किल आन पड़ी है, कोऊ परेसान कर रओ है तो बो का करहै. या तो अकेलेई संकटन से निपटे या फिर अकेले लड़-लड़ के मर जैहे. समस्या सबई पे आत हैगी पर जाको जो मतलब तो नईयाँ के बाए अकेले छोड़ दओ जाए. आजकल खेती-किसानी बैसेईं बहुतईं कठिन हो गई हैगी, कभऊँ पानी कम बरसबे को संकट तो कभऊँ जादा बरसबे से फसल ख़राब होबे को डर; कभऊँ फसल को दाम सही न मिलबे को रोबो तो कभऊँ बैंकन को रोबो. अब ऐसे में यदि सबई जनें संगे होयें, मिल-बैठ के कछु समाधान सोचो जाए तो ऐसो नईयाँ के कौनऊ हल न निकरे. एक बात तो सबई जनन को मानने पड़है कि जा देस में, जा समाज में किसानी करबो सबसे मुस्किल काम हैगो और उत्तो लाभऊ नईं रह गओ, जित्ती के बामें मेहनत लग जात है, लागत लग जात है, पर जाको जो मतलब तो नईयाँ के सिगरे किसानियई बंद कर दें. ऐसोई यदि सीमा पे लगबे बारे बीर जुआन सोचन लगें तो का हुईए?
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जाके लाने गाओं के किसान भैया एक-दो बातन को ख्याल रख लें तो सियात कछु दिक्कत कम होबे. एक तो हम गाओं के लोगन को जे सहर बालिन की फिजूल की नक़ल करबो बंद कर देन चइए, कायेसे कि जासे मिलत कछु नईयाँ, नुकसान ऊपर से हो जात है. जे सहर की नक़ल करके जाने कौन-कौन से खर्चा अब सिगरे गाओंन में होन लगे हैं. जौन काम में तनक सो खर्चा आत हतो अब बामें मार तामझाम करो जान लगो है. जेई दिखाबे के चक्कर में छोटे किसान भैया गाओं के बड़े किसानन से, जमींदारन से, आसपास के महाजनन से, अपने रिश्तेदारन से, बैंकन से कर्जा ले लेत हैं. एक तो मौसम के मारे, फसल को दाम सही से न मिल पाबे के मारे किसानन को कछु लाभ हो नईं पा रओ, तापे जो कर्जा..... सोई किसान भैया परेसान रहन लगत हैं. अपने जान-पहचान बालिन से, बैंकन से कर्जा लेबो बुरी बात नईयाँ पर बाको गलत इस्तेमाल बुरो है. और आजकल जोई जादा हों लगो है. बस एक जोई काम सही से करबे की ठान लेओ, फिर देखो जाने कित्ती समस्याएं अपएं आप दूर खड़ी दिखाई दैहें. चलो, भैया उरें, अभे के लाने इत्तियई बात, बाकी थोड़ी-मोरी और कर लई जैहे अगली बार. तब तक के लाने राम-राम.

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