15/12/2014

लाला हरदौल : बुन्देलखण्ड के लोक-देवता



बुन्देलखण्ड की पावन-भूमि ने हमेशा ही अपनी उर्वरा-भूमि से वीर-वीरांगनाओं को जन्म दिया है. ये वीर-वीरांगनायें आज भी किंवदन्तियों और जनश्रुतियों के द्वारा हमारे बीच उपस्थित हैं. इनमें से कुछ ने तो मनुष्यत्व से उपर उठकर देवत्व स्थान प्राप्त कर लिया है. इसके पीछे इनकी वीरता, आदर्शवादिता, चारित्रिक विशेषताओं के साथ-साथ आमजन की इनके प्रति श्रद्धा एवं विश्वास भी अपनी अहम भूमिका का निर्वहन करते हैं. बुन्देलखण्ड की असंख्य वीर-वीरांगनाओं के बीच ऐसा ही एक नाम लाला हरदौल के रूप में जन-जन के मध्य प्रतिष्ठित है, जो अपने श्रेष्ठतम गुणों, भाभी के सतीत्व की खातिर प्राण न्यौछावर करने और पारिवारिक मर्यादाओं, संस्कारों का भली-भांति निर्वहन करने के कारण देवत्व रूप में स्थापित हो चुका है. वीर हरदौल द्वारा देवर-भाभी के रिश्ते की पावनता, पवित्रता को अक्षुण्य बनाये रखने के लिए किये गये विषपान ने और मरणोपरान्त अपनी भांजी के विवाह संस्कार को निर्विध्न सम्पन्न करवा देने की जनश्रुति ने उन्हें सम्पूर्ण बुन्देलखण्ड के आराध्य के रूप में प्रतिष्ठित करवा दिया है. आज भी शायद ही कोई हिन्दू परिवार होगा जहां पर विवाह के मंगल अवसर पर महिलाओं द्वारा मंगलगीत गाकर लाला हरदौल को ब्याह का न्यौता न दिया जाता हो.
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लाला हरदौल ओरछा नरेश वीर सिंह बुन्देला के सबसे छोटे पुत्र तथा ओरछा के प्रतापी महाराजा मधुकरशाह के नाती थे, इनकी माता का नाम गुमान कुँअरी था जो नरेश वीर सिंह बुन्देला की दूसरी पत्नी थी. हरदौल का जन्म श्रावण शुक्ल पूर्णिमा संवत १६६५ (दिनांक २७ जुलाई १६०८ ई०) को दतिया में हुआ था. दतिया का इलाका रामशाह के बड़े पुत्र संग्राम सिंह की रियासत में आता था और सन १५९५ ई० में उनके देहांत के पश्चात् उनका पुत्र भरतशाह यहाँ का जागीरदार बना. भरतशाह ने दतिया के उत्तरी भाग स्थित एक पहाड़ी पर भरतगढ़ का निर्माण करवाया, जिसे कालांतर में वीर सिंह बुन्देला ने हस्तगत कर लिया. इसी भरतगढ़ में लाला हरदौल का जन्म हुआ था. उधर ओरछा के तत्कालीन राजा रामशाह आगरा में जहाँगीर की कैद में थे. सन १६०८ ई० में जहाँगीर ने उन्हें इस शर्त पर रिहा किया कि वे ओरछा का राज्य वीर सिंह को देकर चंदेरी-बानपुर चले जाएँ. ऐसा होने पर वीर सिंह बुन्देला भरतगढ़ से ओरछा आ गए.
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हरदौल के जन्म के कुछ दिन बाद ही उनकी माता का देहांत हो गया, ऐसे में उनका पालन-पोषण वीर सिंह बुन्देला के ज्येष्ठ पुत्र जुझार सिंह की पत्नी चम्पावती ने किया. हरदौल का विवाह सन १६२८ ई० में दुर्गापुर (दतिया) के दिमान लाखन सिंह परमार की पुत्री हिमांचल कुंअरी के साथ संपन्न हुआ. सन १६३० ई० में उनके एक पुत्र विजय सिंह पैदा हुआ.  लाला हरदौल ने अल्पायु में ही जबरदस्त प्रसिद्धि प्राप्त कर ली थी. इसके पीछे उनका वीर योद्धा होने के साथ-साथ धर्मवीर, दानवीर, दयावीर आदि होना भी था. दरअसल वीर सिंह बुन्देला ने हरदौल को शस्त्र के साथ-साथ शास्त्रों की भी शिक्षा दिलवा रखी थी. स्वयं हरदौल भी अपने पिता के साथ युद्ध अभियानों में नियमित रूप से जाते रहते थे, इस कारण उनको युद्ध विद्या का वास्तविक ज्ञान भी हो गया था. इन गुणों के कारण जनता में वे लोकप्रिय हो गए थे और जनता भी उन्हें देवताओं की तरह पूजती थी. हरदौल की वीरता, उनके पराक्रम और जनता में उनकी लोकप्रियता देखकर ओरछा नरेश वीर सिंह बुन्देला ने एरच का जागीरदार बना दिया. किसी जागीर के राजा के रूप में हरदौल की ये पहली सनद थी. कालांतर में वीर सिंह बुन्देला जब अत्यंत वृद्ध हो गए और उनकी अस्वस्थता के चलते उनके पुत्रों में लगातार विद्रोह जैसी स्थिति बन रही थी. पारिवारिक समस्या को सुलझाने के लिए उन्होंने ज्येष्ठ पुत्र जुझार सिंह को अपना उत्तराधिकारी घोषित करते हुए हरदौल को दतिया राज्य का दिमान बनाया. तत्कालीन व्यवस्था में दिमान के पास प्रशासनिक दायित्वों के साथ-साथ सेना का भी दायित्व हुआ करता था. पुत्रों के बीच किये गए जागीरों के बंटवारे में अबकी हरदौल के हिस्से में एरच के स्थान पर बड़ागांव की जागीर आई.
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लाला हरदौल के सम्बन्ध में दो घटनाएँ बुन्देलखण्ड क्षेत्र में चर्चा में रही हैं. पहली घटना के अनुसार सन १६२७ ई० में वीर सिंह बुन्देला का देहांत हो गया. नियमानुसार ओरछा की गद्दी पर उनके उत्तराधिकारी ज्येष्ठ पुत्र जुझार सिंह आसीन हुए, लाला हरदौल के पास दिमान का पद यथावत रहा. इधर ओरछा में सत्ता परिवर्तन हुआ और उधर मुग़ल शासन में भी सत्ता परिवर्तन हुआ. जहाँगीर की मृत्यु होने के पश्चात् शाहजहाँ की ताजपोशी आगरा किले में सन १६२८ ई० में की गई. इस रस्म का निमंत्रण ओरछा के तत्कालीन नरेश जुझार सिंह को भी भेजा गया. लाला हरदौल, चम्पत राय सहित अन्य बुन्देला राजाओं ने, सरदारों ने जुझार सिंह को इस समारोह में न जाने की सलाह दी. इसका कारण बुंदेलों और मुगलों के सम्बन्ध अच्छे न होना था. इधर जुझार सिंह लगातार विद्रोह कर रहे अपने अन्य भाइयों और पारिवारिक समस्याओं से परेशान थे और इससे छुटकारा पाने के लिए संरक्षक के रूप में मुग़ल शासक का साथ चाहते थे, उधर विद्रोहियों के साथ लगातार युद्ध करते-करते शाहजहाँ के पास पर्याप्त धन और सेना का अभाव हो गया था. दोनों ही अपने-अपनी समस्याओं के चलते एक-दूसरे का साथ चाहते थे किन्तु इसमें मूल अंतर ये था कि जुझार सिंह बिना किसी धोखे के मुग़ल शाहजहाँ की मदद चाहता था जबकि शाहजहाँ जुझार सिंह को धोखे से बंदी बनाकर उसे सहायता देने को मजबूर करना चाहता था. शाहजहाँ के इस षडयंत्र की जानकारी जुझार सिंह को कतई नहीं थी, वे तो आगरा जाने से रोकने की बात को अपने भाइयों का विद्रोह जैसा ही समझ रहे थे. अंततः जुझार सिंह ने किसी की बात न मानते हुए आगरा जाने का निर्णय लिया और अपने साथ नजराने के रूप में एक लाख रुपये और चार हाथी लेकर आगरा जा पहुँचे. जिस बात की आशंका हरदौल और अन्य बुन्देला सरदारों ने जताई थी, हुआ भी कुछ वैसा ही. जुझार सिंह को कैद किये जाने की पूरी योजना थी, जिसकी भनक किसी तरह जुझार सिंह को लग गई और वे बिना किसी को बताये आगरा से ओरछा भाग निकले. शाहजहाँ को जब इसका पता चला तो उसने महावत खान को जुझार सिंह का पीछा करने भेजा. महावत खान ने जुझार सिंह के भाई भगवान राय और पहाड़ सिंह की सहायता से ओरछा के पास सतारा नदी किनारे जुझार सिंह को पकड़ने की योजना बनाई. इधर हरदौल ने महावत खान की सेना का सामना करने के लिए सतारा नदी के तट पर घेराबंदी कर ली. जम कर युद्ध हुआ जिसमें महावत खान को पराजय का मुँह देखना पड़ा. इससे भी हरदौल की ख्याति और बढ़ गई.
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इस घटना के बाद से शाहजहाँ की नजरों में हरदौल खटकने लगे. वो किसी भी तरह से जुझार सिंह और अपने बीच के रास्ते में आ रहे हरदौल को समाप्त करना चाहता था. सतारा नदी तट की पराजय के कुछ दिन बाद महावत खान ने कुचक्र रचना शुरू कर दिया. उसने जुझार सिंह के कान हरदौल के विरुद्ध भरने प्रारंभ कर दिए. इसी के साथ ओरछा और आसपास के क्षेत्रों में किसी न किसी रूप में उसके सिपाहियों द्वारा आतंक फैलाया जाता रहा और ये सिद्ध किया जाता रहा कि ये सब हरदौल से शाहजहाँ की नाराजगी के कारण हो रहा है. जुझार सिंह लगातार विरोधियों के कुचक्र में फँसते जा रहे थे और उनको विश्वास होने लगा था कि ओरछा या आसपास होने वाली अराजक गतिविधियों का कारण हरदौल है. महावत खान को जब इस बात का पूरा भरोसा हो गया कि जुझार सिंह हरदौल से नाराज हैं तो उसने जुझार सिंह को शाहजहाँ से मुलाकात करवाने और ओरछा में शांति कायम करवाने के लिए तैयार कर लिया. इस बार भी हरदौल ने जुझार सिंह को रोकने की कोशिश की किन्तु वे हरदौल की बातों को न मानकर आगरा के लिए निकल गए. आगरा में जुझार सिंह के साथ अमानवीय व्यवहार किया गया, उन्हें तलवार की दम पर शाहजहाँ ने अपने पैरों पर झुकने को मजबूर कर दिया. अंत में जुझार सिंह की रिहाई के बदले १५ लाख रुपये, ४० हाथी और करैरा का परगना भी देना पड़ा. इसके अलावा दक्षिण में मुग़ल सेना के साथ जाने की नौकरी करने को भी बाध्य होना पड़ा.
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जुझार सिंह मुग़ल सेना के साथ दक्षिण में थे और यहाँ ओरछा के दिमान होने के नाते हरदौल लगातार सत्ता सञ्चालन करने में लगे थे. उनका शासन जुझार सिंह के शासन की तुलना में ज्यादा उत्तम रूप से चल रहा था. ओरछा के विरोधी भी लगातार परास्त होते जा रहे थे. इसके अलावा हरदौल का साथ देने के लिए भी अन्य छोटे-छोटे राजा तैयार होते जा रहे थे. अपनी वीरता और शौर्यक्षमता के कारण वीर हरदौल ने मुगलों से अनेक युद्धों में विजय प्राप्त की. वीर हरदौल के साहसिक कारनामों से मुसलमानों में खलबली मच गई और इस्लाम के प्रचार-प्रसार की कुचेष्टा से इनका बुन्देलखण्ड की सीमा में आना-जाना बन्द हो गया. हरदौल की ये कामयाबी शाहजहाँ के साथ-साथ जुझार सिंह को भी खटक रही थी. इस बीच सन १६२९ ई० में शाहजहाँ की कैद से खानजहान लोधी अपनी सेना सहित आगरा से भाग निकला. चूँकि खानजहान बुन्देलाओं का सहयोगी रहा था ऐसे में हरदौल ने उसे ओरछा की सीमा से निर्बाध निकल जाने में मदद की. जब शाहजहाँ को इसकी खबर लगी तो वो आगबबूला हो उठा, उसने जुझार सिंह को आदेश दिया कि जिंदा या मुर्दा खानजहान लोधी को पकड़ा जाये. मजबूरन जुझार सिंह को अपने बेटे विक्रमाजीत को लोधी को पकड़ने भेजना पड़ा. काफी मुश्किलों के बाद भी खानजहान लोधी तो नहीं पकड़ा गया किन्तु उसका भाई और बेटे को मारने में विक्रमाजीत को सफलता मिली. हालाँकि इस युद्ध में २०० बुंदेला सैनिक भी मारे गए. जुझार सिंह का मानना था कि ये समस्या सिर्फ हरदौल के कारण सामने आई है, इसको और पुष्ट करने का काम हरदौल के विरोधियों ने किया, वे जुझार सिंह के कान भरने में पीछे नहीं रह रहे थे. जुझार सिंह ने तय कर लिया कि अब हरदौल को रास्ते से हटाना ही पड़ेगा.
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ओरछा में दशहरा उत्सव की तैयारियाँ चल रही थी. हर बार की तरह हरदौल भी अपने साथियों के साथ ओरछा किले आये हुए थे. जुझार सिंह भी ऐसे ही किसी अवसर की तलाश में थे कि हरदौल को किसी बहाने से आसानी से अपने रास्ते से हटा सकें. आश्विन शुक्ल दशमी संवत १६८८ (दिन रविवार दिनांक ५ अक्टूबर १६३१) को दशहरा का उत्सव धूमधाम से मनाया जा रहा था. जुझार सिंह ने भोज के समय हरदौल और उनके साथियों को तीव्र विषयुक्त भोजन खिलवा दिया. जहर इतना तीव्र था कि हरदौल और उनके साथियों की हालत तुरंत बिगड़ने लगी. जब उन्हें लगने लगा कि अब वे बच नहीं सकते हैं तो अंतिम समय में भगवान रामलला के दर्शन करने ओरछा मंदिर में गए और वहीं उनका देहांत हो गया. जब नगर में ये समाचार फैला तो हरदौल के प्रशंसकों ने उपद्रव कर दिया. जुझार सिंह पहले से ही ऐसी किसी भी स्थिति से निपटने को तैयार बैठे थे और उन्होंने उत्पात करने वाले लगभग ९०० हरदौल समर्थकों को मरवा दिया.
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हरदौल की मृत्यु से सम्बंधित एक और कथा समाज में प्रचलित है. एक कूटनीतिक चाल के तहत जब शाहजहाँ ने लाला हरदौल के बड़े भाई ओरछा नरेश जुझार सिंह को आगरा बुला लिया तो जुझार सिंह की अनुपस्थिति में फारस का एक मुगल ओरछा में इस्लाम के प्रचार के लिए आ गया. उसने प्रचार के साथ-साथ ओरछा में आतंक मचाना भी शुरू कर दिया. विपत्ति के ऐसे समय में जुझार सिंह की पत्नी रानी चम्पावती ने लाला हरदौल को एरच से ओरछा बुलवा कर पठान को मरवाने का आदेश दिया. लाला हरदौल वैसे भी अपने बड़े भाई जुझार सिंह से और अपनी भाभी रानी चम्पावती से अत्यधिक स्नेह रखने के कारण ओरछा आते-जाते रहते थे और जुझार सिंह की अनुपस्थिति में यहां का शासन भी देखते थे. ओरछा में लाला हरदौल के आने के समाचार ने वीरों में उत्साह का संचार कर दिया. वे सभी अपने पूरे जोशोखरोश से पठान का मुकाबला करने लगे. पठान के बारे में कहा जाता था कि उसकी तलवार से लोहे के अस्त्र भी कट जाते थे, उससे मुकाबला करने के लिए किसी विशेष अस्त्र की आवश्यकता थी. ऐसे विपरीत समय में रानी चम्पावती ने लाला हरदौल को पठान का मुकाबला करने के लिए जुझार सिंह की पूजा वाली विशेष तलवार दे दी जो एक विशेष प्रकार के बक्से में रहती थी. महाराज जुझार सिंह की विशेष तलवार से लाला हरदौल ने पठान का वध कर दिया. पठान का वध होते ही एक ओर जहां ओरछा उत्साह और खुशी में झूम उठा वहीं दूसरी ओर लाला हरदौल के विरोधियों के सीने पर साँप लोट गया.
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शाहजहां ने जुझार सिंह पर लाला हरदौल को राज्य से निकालने का दबाव बनाया किन्तु लाला हरदौल से पुत्रवत् स्नेह रखने के कारण जुझार सिंह इस बात के लिए कतई तैयार नहीं हुए. शाहजहां ने भी हार न मानते हुए कूटनीति के द्वारा लाला हरदौल और रानी चम्पावती के मध्य अनैतिक सम्बन्धों का शक जुझार सिंह के अन्दर पैदा कर दिया. शाहजहां की इस कूटनीति का व्यापक प्रभाव जुझार सिंह के ओरछा लौटने पर हुआ जबकि लाला हरदौल के विरोधियों द्वारा लाला हरदौल और रानी चम्पावती के मध्य अनैतिक सम्बन्धों की चर्चा, पठान को मारने के लिए जुझार सिंह की पूजा वाली तलवार रानी द्वारा लाला हरदौल को देने की बात पता चली. कान के कच्चे जुझार सिंह ने रानी चम्पावती को मजबूर किया कि वे खाने में विष मिलाकर हरदौल को धोखे से खिला दें. हरदौल को जब ये बात चम्पावती ने बताई तो उन्होंने माँ समान भाभी के सतीत्व की रक्षा की खातिर विषयुक्त भोजन बिना किसी हिचक के ग्रहण कर लिया. कहा ये भी जाता है कि लाला हरदौल के देहांत के बाद उनके मेहतर ने, घोड़े और कुत्ते ने उसी विषयुक्त भोजन को खाकर अपने प्राण त्याग दिए तथा नगर में समाचार फैलते ही उनके लगभग ९०० समर्थकों ने दुखी होकर आत्महत्या कर ली.
उक्त दोनों घटनाओं के संदर्भों को यदि ऐतिहासिक दृष्टि से देखें तो यह स्पष्ट होता है कि जुझार सिंह अन्य भाइयों के विद्रोह और मुग़लों के आतंक के कारण परेशान रहा करते थे. कहीं न कहीं किसी कारण से उनके और हरदौल के मध्य भ्रम की, मतभेद की स्थिति बनी हुई थी. उनको इस बात का डर पैदा कर दिया गया था कि यदि लाला हरदौल पर जल्द ही अंकुश न लगाया गया तो वे किसी न किसी दिन ओरछा की गद्दी से जुझार सिंह को उतार कर स्वयं आसीन हो जायेंगे. मतभेद की बात कई जगह सामने आई है किन्तु इस बात के स्पष्ट संकेत कहीं नहीं मिले कि जुझार सिंह ने ये माना हो को उनकी पत्नी और हरदौल के बीच अवैध सम्बन्ध रहे. यहाँ इस तथ्य को स्मरण रखना होगा कि हरदौल के जन्म के समय उनके पिता वीर सिंह की आयु ६६ वर्ष थी, जुझार सिंह और उनकी पत्नी चम्पावती की आयु क्रमशः ४५ वर्ष और ३९ वर्ष थी. जुझार सिंह के पुत्र विक्रमाजीत की आयु १९ वर्ष थी और तो और विक्रमाजीत का पुत्र हरदौल के जन्म के कुछ दिनों बाद ही पैदा हुआ था. इस सम्बन्ध में भी वात्सल्यपूर्ण एक घटना प्रचलित है. चूँकि हरदौल के जन्म के कुछ समय पश्चात् ही उनकी माता का देहांत हो गया था इस कारण उन्हें स्तनपान करवाने का दायित्व विक्रमाजीत की पत्नी कमल कुंअरी को सौंपा गया. जब हरदौल को दूध पिलाने के लिए लाया जाता तो बाकायदा सूचित किया जाता कि कक्का जू पधार रहे हैं, रिश्ते में हरदौल कमल कुंअरी के चचिया श्वसुर हुआ करते थे. कमल कुंअरी ससम्मान घूँघट डालकर खड़ी हो जाती और लाला हरदौल को गोद में लेकर स्तनपान करवाने के पश्चात् ससम्मान विदा करती. ऐसी वात्सल्यपूर्ण स्थिति होने के कारण दूसरी घटना पर सहजता से विश्वास नहीं किया जा सकता है.
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हरदौल की मृत्यु के पश्चात् उनकी बहिन कुंजावती हरदौल का पार्थिव शरीर दतिया ले आई, जहाँ उनका अंतिम संस्कार किया गया. लाला हरदौल की बहिन कुंजावती दतिया के राजा रणजीत सिंह को ब्याही थी. हरदौल के समाधि स्थल पर एक मंदिर का निर्माण किया गया जो आज भी स्थापित है तथा लोगों की श्रद्धा का केंद्र बना हुआ है. सन १७१५ ई० में दतिया के राजा रामचंद्र ने हरदौल मकबरे के समीप एक तालाब का निर्माण भी करवाया, जिसका नाम हरदौल के नाम पर लला का ताल रखा, इसे आज लाला का ताल कहा जाता है. लाला हरदौल के देहांत के बाद की एक कथा आज भी सम्पूर्ण बुन्देलखण्ड क्षेत्र में श्रद्धा और आस्था के साथ सुनी-सुनाई जाती है. कहते हैं कि हरदौल के देहांत के कुछ समय बाद उनकी बहिन कुंजावती की बेटी का विवाह संपन्न होना था. कुंजावती लाला हरदौल की मृत्यु को लेकर अपने बड़े भाई जुझार सिंह से नाराज थी और इसी कारण वह अपनी पुत्री कुंअरि के विवाह में भात के लिए लाला हरदौल की समाधि पर पहुंची. लाला हरदौल की समाधि पर बहिन कुंजावती ने आँसुओं भरी गुहार लगाई कि यदि लाला हरदौल अपनी भांजी के विवाह में भात लेकर नहीं आये तो वह भी आत्महत्या कर लेगी. तब लाला हरदौल ने उसे दर्शन देकर विवाह में भात लाने का आश्वासन दिया. सम्पूर्ण बुन्देलखण्ड में ऐसी मान्यता है कि लाला हरदौल ने अपनी बहिन कुंजावती की बेटी के ब्याह में भात की रस्म का निर्वहन किया और बाद में दर्शन देकर अपने देवत्व को प्रतिष्ठित किया.
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ऐसी जनश्रुति है कि विवाह के अवसर पर भात की सामग्री गाड़ियां भर-भर कर आने लगीं. लाला हरदौल ने उचित समय पर स्वयं बहिन को भात पहनाया और बारात को भी अदृश्य रूप से भोजन के समय घी परोसने का कार्य किया. बारातियों को घी का पात्र तो दिखाई देता था किन्तु घी परोसने वाला नहीं दिखाई देता था. जब दूल्हे के सामने घी का पात्र आया और अदृश्य स्वर सुनाई दिया-“घी लीजिए” तो दूल्हे ने घी का पात्र अपने हाथों से पकड़ कर पहले दर्शन देने को कहा. दूल्हे की अनुनय भरी जिद पर लाला हरदौल ने सभी को दर्शन दिये और पाँच गाँव अपने मान्य को दान में देकर अन्तर्ध्यान हो गये।
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इन दिव्य-दर्शनों, वीरोचित गुणों ने वीर हरदौल को समूचे बुन्देलखण्ड का लोकदेवता बना दिया. बुन्देलखण्ड के गांवों के अतिरिक्त उत्तर भारत, मध्य प्रदेश, पंजाब, राजस्थान के गांवों में भी लाला हरदौल के चबूतरे पाये जाते हैं. विवाह के अवसर पर लाला हरदौल को निमंत्रित करने वाले कुछ लोग तो ओरछा जाकर उनकी समाधि पर निमंत्रण-पत्र चढ़ाते हैं. जो लोग ओरछा पहुँचने में असमर्थ होते हैं वे अपने गाँव अथवा आसपास किसी क्षेत्र में बने हरदौल चबूतरा पर जाकर वैवाहिक निमंत्रण-पत्र चढ़ाते हैं. ऐसी मान्यता है कि लाला हरदौल विध्न-बाधाओं को रोककर मांगलिक कार्य निर्विध्न संपन्न होने देते हैं. हिन्दू विवाह के मंगल अवसर पर लाला हरदौल के आने का विश्वास, मान्यता उनके प्रति बुन्देलखण्डवासियों की श्रद्धा-भक्ति को ही दर्शाता है. मनुष्य के कृत्य ही उसको इतिहास के पन्नों में स्वर्णांकित करते हैं और उसे देवत्व के आसन तक ले जाते हैं. वीर हरदौल भी श्रद्धा और विश्वास के द्वारा देवत्व आसन पर विराजित होकर बुन्देलखण्ड के आराध्य रूप में हमारे बीच आज भी जीवित हैं और सदा-सदा को जीवित रहेंगे.

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