06/02/2015

बुन्देलखण्ड के किसानन की समस्या



जा बात हम सबई जनन बहुत पैले से जानत हैं कि हमाओ देस किरसी प्रधान रहो है। इतै की अर्थव्यवस्था को बहुत बड़ो हिस्सा जैई किसान भइयन की मेहनत से उपजी फसल से पूरो होत है। जई खेती-किसानी के कारण से देस को बहुत बड़ो मानस जामें लगो है और जई से अपनो पेट पाल रहो है। जऊ सबके बाद हमाए इतै के किसान भइयन को बहुतई बुरी तरह से परेसान होने पड़ रओ है। किसान भइयन के परेसान होबे की बातें अकेले अपएँ बुन्देलखण्ड में नईं हो रईं हैं बल्कि देखो जाये तो देस के बहुतन राज्य में ऐसो हो रओ है। सबईं जगह के हालात अलग-अलग हैं और इनई के मारे अपएँ किसान भइयन को समस्याएँ आ जात हैंगीं।
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अब अपएँ बुन्देलखण्ड को देख लेओ, इतै की माटी जैसी उत्तम माटी पूरे देस में सायतई कहूँ और मिले। इतै की फसलऊ बहुत अच्छी होत है, जऊ के बाद इतै के किसान भइयन को उनकी फसल को पूरो-पूरो दाम नईं मिल पात है। जईसे बे बहुतई बार परेसान हो जात हैं और जई कारण से उनको मन खेती-किसानी से उचटन लगत है। किसान भइया खती-किसानी छोड़ के, अपओं गाँओ छोड़ के जान लगत हैं, कहूँ और कछू और काम करबै के लाने। देखो जाये तो अपएँ बुन्देलखण्ड में खेती के पिछड़बे के बहुतई-बहुत कारण दिखत हैं। एक तो इतै को मौसम बहुतई गरम है, जाके मारे किसान भइया पूरी साल भर खेतन में काम नईं कर पात हैं; जाके अलाबा इतै अपईं जोतन को आकारऊ लगातार छोटो होत जा रओ है, जा चक्कर में ढंग से कौनऊ फसल होत नईंयाँ। देखो जाये तो जोतन के छोटे हाबे के मारे अपएँ इतै के किसान नकदी फसलन को उगाबै से बचत हैं। जऊ के संगे-संगे एक और बहुतई बड़ी समस्या देखबे में आई है और बा है फसल को सही दाम पै न बिकबे की।
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जा समस्या जासे है कि अपएँ बुन्देलखण्ड में मंडियाँ गाँओं से दूर सहरन में बनी हैं और उतै तक जाबे के लाने सड़कन की बिबस्था अच्छी नईंयाँ। सड़कें बहुतई खराब हैं, तऊ पै लूटमार को डर बनो रहात है। सबई किसान भइयन के पास अपईं फसल सहर की मंडियन में भेजबे के लाने कौनऊ उन्नत साधनऊ नईंयाँ। जाकै लाने बे सिगरे या तो कौनऊ दूसरे पे निरभर रहत हैं या फिर अपईं बैलागाड़ी को सहारा लेत हैं। अपईं फसल को इकट्ठो रोके रखबे के लाने उनके पास ठौर-ठिकाना तौ हौत नईंयाँ, जामें सुरच्छित रखके बे मौका पड़बै पे फसल बेंच सकें। खुले में धरी उनकी फसल कबहूँ आँधी-पानी से बरबाद होत है तो कबहुँ जानवर, चूहा, कीड़ा-मकोड़ा खराब कर जात हैं। जैई सब ठठकरमन से बचबै के लाने गाँओं के छोटे-छोटे किसान भइया अपईं फसल को गाँओं के या उतईं आसपास के कौनऊ बड़े कास्तकार को बेच देत हैं। जई कै मारे उनैं उनके मन के दाम नईं मिल पात हैं।
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एक तो ऊबड़-खाबड़ रस्तन पै चलकै मंडियन तक पहुँचबोई बहुत मुस्किल को काम होत है, कौनऊ छोटो किसान यदि हिम्मत करके उतै पहुँचई जात है तो उतै पहले से टहल रहे दलाल बिकबे के लाने आई फसल पै गीधन से टूट पड़त हैं। समय से फसल बिक जाये, सही से बा फसल को दाम मिल जाये जाके लाने किसान भइया बहुतई बार इन दलालन के चक्कर में फँस जात हैं। जऊ कारण से उनैं उनकी फसल को सही दाम नईं मिल पात है। यदि कैसंेऊ करके किसान इन दलालन से बच जाये तो मंडियन में बैठे बड़े-बड़े आढ़तिया उनैं लूटबे के लाने तैयार रहत हैं। उनऊ को जा अच्छे से मालूम होत है कि इन किसानन को अभै बापस गाँओ जाने है, इतै सहर में उनके रुकबे को कौनऊ ठौर नईंयाँ। जाकै मारे बे आढ़तियऊ औने-पौने दामन पै किसानन की फसल को खरीदन की बात करत हैं। किसानऊ अपईं परेसानी के मारे, किसानी के काम में लई भई उधारी को चुकाबे के लाने, घर को जरूरी सामान लैबे के लाने फसल कम दामन में बेंचबे को मजबूर हो जात है।
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सरकार को, स्थानीय पिरसासन को जा बिबस्था में सुधार करबे की जरूरत है। सहरन की बड़ी-बड़ी मंडियन के संगै-संगै गाँओन के आसपास कछु छोटी-छोटी मंडियन को खुलबान चहिए। जासै कि छोटे किसानन  को परेसान न होन पड़े। पिरसासन जऊ बात को ध्यान रखे कि मंडियन के आसपास दलालन को टहलबो न होए, मंडियन में फसल बेचत समय इन किसानन को कोऊ परेसान न करत होए। जाकै अलाबा गाँओं-जुहार में फसल को सुरच्छित रखबै की बिबस्था भी बाको करन चहिए, जासै कि कछु समस्या होबै की स्थिति में उतै के किसान अपईं फसल को सुरच्छित रख सकें। सड़कन को सही करबे को काम, उनैं सही रखबे को काम, बरसात के बाद उनमें हो जान बाले गड्ढन को भरबै को इंतजाम आदि को समय से करान चहिए। जाके संगै-संगै पिरसासन को इन सड़कन पै सुरच्छा बिबस्था सही करबै को काम करान चहिए, जासै कि उतै पे अपईं फसल ले के जात में किसानन को लूटपाट का डर-भय न होए। यदि सरकार या फिर पिरसासन इत्तोई थोड़ो सो काम करन लगे और किसानन की दिक्कतन को समझन लगे तो न सही सिगरै पर बहुतन किसानन को लाभ होन लगहै। एकई बार कौनऊ किसान को बाकी फसल को सही दाम मिल गओ तो बाकी देखादेखी औरऊ किसान अपएँ खेतन में मन से काम करन लगहैं। जासे किसानन को गाँओं छोड़बो रुकहै और उनको कछू न कछू और बिकास होएहै। अपएँ किसान भइयनऊ को जाकै लाने इकट्ठो होके पिरसासन से मिलबे की, बाके ऊपर जोर दिखाबे की जरूरत है।

ये लेख प्रवासनामा के १६ जनवरी २०१५ के अंक में प्रकाशित हुआ.

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