28/12/2017

इतिहास की तंग गलियों में जनपद जालौन - 4

देवेन्द्र सिंह जी - लेखक 
महाभारत के काल में हम पाते हैं कि यहाँ पर चेदियों का शासन था। दमघोष के पुत्र शिशुपाल ने इस क्षेत्र से कुरु वंश का शासन समाप्त करके चेदि राज को पुन: स्थापित कर लिया। यह वही शिशुपाल है जिसका वध श्रीकृष्ण ने युधिष्ठिर के राजसूर्य यज्ञ में किया था। इस समय बहुत से प्रमुख चेदियों के बारे में पढ़ने को मिलता है। चेदिराज उपरिचर, वसु की पत्नी गिरिका का भाई वसु का सेनापति था नकुल की पत्नी करनमति चेदि थी। पांडवों ने बनवास का बहुत समय चेदियों के यहाँ व्यतीत किया था। भीम की पत्नी चेदि थी। दमघोष, शीशपाल, धृष्टकेतु, सुकेतु, शरभ, आदि सब चेदि ही थे। शिशुपाल की माता श्रुतिकीर्ति और कुंती आपस में बहिनें थीं। इनके भाई बासुदेव थे। वसु के चार पुत्रों के अलावा निषाद स्त्री से एक पुत्र और एक पुत्री थी। पुत्र ने अपने बाहुबल से मत्स राज कायम किया लेकिन कन्या अपने निषाद परिवार के साथ यमुना के किनारे ही रही जो कुरु राज का क्षेत्र था। शांतुन की पत्नी सत्यवती का जन्म इसी परिवार में हुआ था।  वेदव्यास, चित्रगुप्त, और विचित्रवीर सत्यवती के ही पुत्र थे। महाभारत के युद्ध में चेदि पांडवों के साथ रहे उनके राजा शिशुपाल का उतराधिकारी धृष्टकेतु ने अपने भाई शरभ के साथ पांडवों का साथ दिया था। इसी आधार पर ई०जे०रेपसन ने कैम्ब्रिज हिस्ट्री आफ इंडिया भाग प्रथम में लिखा कि महाभारत के युद्ध के बाद भी जालौन के क्षेत्र में चेदि राज बना रहा।

महाभारत के बाद चेदियों के बारे में कुछ ज्यादा पता नहीं चलता है। पुराण भी इस बारे में मौन हैं। लेकिन ईसा से ६००वर्ष पूर्व उत्तरभारत के सोलह जनपदों का जब उल्लेख मिलता है तब उसमें चेदि राज का उल्लेख है। पोलिटिकल हिस्ट्री आफ एंसियंट इण्डिया में एच०सी०राय लिखते हैं कि इस काल में यहाँ पर वितिहोत्रासों का अधिकार था। ये कौन थे इसके बारे में ज्यादा कुछ नहीं मिला। लेकिन ईसा पूर्व सातवी सदी के प्रारंभ से जालौन का इतिहास स्पष्ट और निश्चित हो जाता है। इसके पूर्व प्रत्येक घटना अस्पष्ट और काल निर्णय अनिश्चत है।

जैन और बौद्ध धार्मिक ग्रंथों से पता चलता है कि इस युग में समस्त उत्तरी भारत में में १६ राज्य थे। इस युग की प्रमुख घटना मगध का उत्कर्ष है। बिम्बसार मगध की महानता का वास्तविक संस्थापक था। उसका उतराधिकारी अजातशत्रु फिर उदयन, जो उसका पौत्र था, का विवरण मिलता है। उदयन के उतराधिकारी नन्दिवर्धन और महानन्दीन थे। कहा जाता है कि महानन्दीन के अवैध पुत्र महापदमनन्द ने नन्द वंश की स्थापना की। उसी ने मगध की सीमाओं का विस्तार किया। इतिहासकारों का मानना है कि ईसा के चार सौ वर्ष पूर्व जालौन का क्षेत्र महापद्मनन्द के अधिकार में आया, लेकिन राज्याभिषेक के वर्ष के बारे में इतिहासकारों में मतभेद है। इतिहासकार एफ०ई०प्रगेटीयर के अनुसार ३८२ बी०सी० आर०के०मुकर्जी के अनुसार ३६४ बी०सी० और एच०सी०राय चौधरी के अनुसार यह तिथि ३५४ बी०सी० है। पुराणों में इसके बारे में बहुत अच्छा नहीं लिखा गया है। भगवत पुराण की एक टीका के अनुसार इसके पास दस पदम सेना तथा उतनी ही संपति थी। इसी कारण इसको महापदम कहा गया है। इसने सबको गद्दी से हटा कर एकछत्र राज्य कायम किया। इसके राज्य की सीमाएं हिमालय से विन्ध्याचल तक थीं। अतः जनपद जालौन भी इसके राज में रहा होगा। इसको उत्तरी भारत का पहला सम्राट भी कहा जाता है। मत्स्य पुराण के अनुसार यह ८८ वर्ष तक जीवित रहा। वायु पुराण में इसके २८ वर्ष तक शासन करने की बात कही गई है। इससे अनुमान लगता है कि ईसा पूर्व ४२९ में इसकी मृत्यु हुई। इस वंश के ८ राजाओं के बारे में पुराणों में उल्लेख है। इसके पुत्र घनानंद के बारे में कहा गया कि वह भी बहुत शक्तिशाली था लेकिन साथ ही बहुत क्रूर तथा लोभी भी था। जनता इससे घृणा करती थी। ३२१ ई०पू० तक नन्द वंश के शासक इस क्षेत्र को अपने अधिकार में किए रहे। इस वंश के अंतिम नरेश घनानंद को चन्द्रगुप्त मौर्य ने चाणक्य की मदद से ३२१ बी०सी० में सिंहासनचुत्य कर दिया और चाणक्य की मदद से मौर्य वंश की स्थापना की।  

भगवती-सूत्र में मोरियपुत्व का उल्लेख मिलता है। इनकी राजधानी पिप्लीवाना में थी। वहाँ के निवासी मोरिय (मौर्य) या मोरिय्पुत कहलाते थे। मोरिय नामक स्थान से संबंध होने के कारण चन्द्रगुप्त मौर्य कहलाया। इतिहासकारों ने इसको शाक्य मूल क्षत्रिय वर्ण का कहा है। इसने अपनी वीरता और चाणक्य की मदद से विशाल साम्राज्य खड़ा किया। चन्द्रगुप्त के दरबार में रह रहे यवन राजदूत मेगस्थनीज ने इंडिका पुस्तक में इसके राज की सीमा पूर्व उत्तर में हिमाड्स (हिमालय) पर्वत, दक्षिण व पूर्व में समुद्र और पश्चिम में सिन्धु बतलाई है। इससे पता चलता है कि जालौन भी मौर्य साम्राज्य का अंग था। वायु पुराण के अनुसार चन्द्रगुप्त ने ई०पू०२९८ में राज्य अपने पुत्र बिन्दुसार (२९८-२७३) को सौंप कर गृह त्याग दिया। जैन अनुश्रुतियों के अनुसार वह उपवास और तप करके मृत्यु को प्राप्त हुआ। बिन्दुसार ने अपने पुत्र अशोक को अवन्ति का शासन सौंपा जिसकी राजधानी उज्जैन और उप राजधानी विदिशा थी। इस समय जालौन अशोक के अधीन था। अशोक (२७३-२३३) ही बिन्दुसार के बाद साम्राज्य का उतराधिकारी हुआ। गजानन माधव मुक्तिबोध की पुस्तक भारत इतिहास और संस्कृति के अनुसार अशोक की मृत्यु के बाद मौर्य शासक अपने राज के पतन को रोक नही सके, प्रतापी मौर्य साम्राज्य सदा के लिए अस्त हो गया। अंतिम मौर्य सम्राट बृहद्रथ था। वह एक कमजोर शासक था। इसका फायदा उठा कर उसके सेनापति पुष्यमित्र नेबृहद्रथ की हत्या करा कर मौर्य साम्राज्य का अंत कर दिया। इस अध्ययन के आधार पर कहा जा सकता है कि मौर्यों का शासन इस क्षेत्र (जालौन) में १३७ वर्षों (३२१-१८४ बी०सी०) तक रहा था।


आज यहीं तक। 
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© देवेन्द्र सिंह  (लेखक)

कॉपीराईट चेतावनी - बिना देवेन्द्र सिंह जी की अनुमति के किसी भी लेख का आंशिक अथवा पुर्णतः प्रकाशन कॉपीराइट का उल्लंघन माना जायेगा. ऐसा करने वाले के विरुद्ध कानूनी कार्यवाही की जा सकती है. जिसके लिए वह व्यक्ति स्वयं जिम्मेवार होगा.

इतिहास की तंग गलियों में जनपद जालौन - 3

देवेन्द्र सिंह जी - लेखक 
आर०सी०मजुमदार और आर०डी० पुश्लकर की पुस्तक द हिस्ट्री एंड कल्चर आफ इंडियन पीपुल भाग दो के अनुसार यहाँ जो आर्य सबसे पहले वे चेदि थे। चेदि राज बहुत पुराना कहा जाता है। इनके दो जगहों पर जाने की बात कही जाती है। एक दल नेपाल गया तथा दूसरा वत्स राज और कुरु राज के मध्य यमुना के किनारे (आधुनिक बुंदेलखंड) में आया। शुरू में ये आर्य यमुना और केन नदियों के मध्य में बसे बाद में नर्मदा तक फैले। इनकी राजधानी शुक्तमती थी। इतिहासकारों के अनुसार शुक्तमती आज का सागर (म०प्र०) है, लेकिन कुछ इतिहासकारों के अनुसार चेदियों की राजधानी त्रिपुरी में थी। बौद्ध ग्रन्थ Anguttara Nikaya में दस जनपदों में चेदि महाजनपद का उल्लेख मिलता है। Dr Binod Bihari Satpathi ने अपने ग्रन्थ Indian Histography के पेज ५६ में लिखा कि शिव जातक के अनुसार चेदि महाजनपद की राजधानी Arithapura में थी। यह कहाँ है मुझको अनुमान नहीं है। कुछ समय चेदि राज को कुरु वंश के वसु ने जीत कर चेदि राज का अंत कर दिया।

इसके बाद पौराणिक परंपरा के अनुसार मनु के पौत्र चन्द्र वंश के संस्थापक एल जो सूर्य वंश के इक्ष्वाकु का समकालीन था के गंगा, यमुना मालवा और पूर्वी राजस्थान पर अधिकार करने का विवरण मिलता है। अतः अपना जालौन जिला भी उसके राज के अंतर्गत आ गया। एल के पुत्र ययाति हुए वे भी यहाँ अधिकार किए रहे। राज के बटवारे में ययाति के बड़े पुत्र यदु को चम्बल, बेतवा, केन नदियों वाला भाग मिला, इससे कहा जा सकता है कि जालौन का क्षेत्र भी यदु के अधिकार में रहा होगा। यदु के वंशज यदुवंशी कहलाए। कुछ समय बाद चन्द्रवंश की मुख्य शाखा से उत्पन्न हैहयों के उदय से यादव वंश का पराभव हो गया, लेकिन कुछ पीढ़ी बाद अयोध्या के राजा सगर द्वारा हैहयों का पराभव हुआ। इसका फायदा विदर्भ के यादवों ने उठाया और उत्तर भारत के भू-भाग पर अधिकार कर लिया। कुछ समय बाद कुरु की पांचवी पीढ़ी में वसु ने यादवों के चेदि राज पर अधिकार कर लिया। प्रो०अर्जुन चौबे काश्यप ने आदि भारत में लिखा कि वसु ने चेदोपरिचर (चेदियों के ऊपर चलने वाला) की उपाधि धारण की। जालौन का क्षेत्र उतराधिकार में वसु के पुत्र प्रत्यग्रह को मिला। प्रत्यग्रह से यह शाखा चलती रही। चेदियों का उल्लेख ऋग्वेद में मिलता है। वसु चेदि को इंद्र का मित्र बतलाया गया है। उसके की पुत्रों के नाम मिलते हैं जो विभिन्न भागों के शासक थे। महाभारत में भी कई प्रमुख चेदियों का उल्लेख मिलता है।


आज इतना ही आगे का हाल फिर अगली पोस्ट में। 
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© देवेन्द्र सिंह  (लेखक)

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27/12/2017

इतिहास की तंग गलियों में जनपद जालौन - 2

देवेन्द्र सिंह जी - लेखक 
ए०घोष ने इंडियन आर्कियोलोजी (१९६३-६४) ए रिव्यू में लिखा कि आर्यों के आगमन के पहले से ही यहाँ पर कोल, भील, शबर, गोंड से मिलती-जुलती जातियों का निवास था। डा० सुनीत कुमार चटर्जी ने कहा कि आर्यों ने द्रविणों को दास, आग्नेय जाति वालों को कोल, भील और निषाद तथा मंगोल जाति के लोगों को किरात कहा है। आर्यों ने इनको अनास भी कहा है। सुयणाचार्य ने अनास का अर्थ आस्य रहित अर्थात वाणी विहीन किया है अर्थात अनस वे थे जिनकी बोली आर्यों की समझ में नहीं आती थी। पुराणों में यक्ष, राक्षस, नाग, किरात आदि का उल्लेख है यह आर्येतर जातियों के अस्तित्व की ही सूचना है। आर्यों का यहाँ पर आने के बाद यहाँ के निवासियों कोई संघर्ष नहीं हुआ। उन्होंने स्थानीय निवासियों को यहाँ से जाने के लिए मजबूर नहीं किया। प्राचीन साहित्य में इस बात का कोई प्रमाण नहीं मिलता कि आर्यों का यहाँ पर रहने वालों से कोई युद्ध हुआ था। ज्यों-ज्यों समय व्यतीत होता गया आर्य यहाँ के निवासियों में मिश्रित हो गये। जो जातियां यहाँ पर निवास करती थीं उनकी भी अपनी सभ्यता और संस्कृति थी। आर्यों ने उनकी सभ्यता और संस्कृति से छेड़छाड़ भी नहीं की बल्कि उनको तथा उनकी सभ्यता और संस्कृति को अपनाने में कोई भी गुरेज नहीं किया। वैदिक देवताओं के साथ-साथ उनके देवता जैसे नाग, गण आदि को भी स्थान मिलना इस बात का पुख्ता प्रमाण है। अधिकांश विद्वानों का यही मानना है कि जो आर्य यहाँ पर आए उन्होंने आपस में मिश्रित होकर यहाँ एक जनसमूह की रचना की। कहा जा सकता है जालौन क्षेत्र में स्थानीय आबादी, जिसके देवता और संस्कृति अलग-अलग थे, का उदय होने लगा था। लगता है वैदिक युग के आर्य मोक्ष के लिए ललायित नहीं थे। वे मानते थे कि सारी सृष्टि किसी एक प्रच्छन्न शक्ति से चल रही है तथा उस शक्ति की आराधना करके मनुष्य सब कुछ प्राप्त कर सकता है। वैदिक प्रार्थनाएँ सबल, स्वस्थ्य, प्रफुल्लित जीवन को प्राप्त करने के लिए हैं।

हम सौ वर्षों तक जियें/ हम सौ वर्षों तक अपने ज्ञान को बढ़ाते रहें/ हम सौ वर्षों तक आनन्दमय जीवन व्यतीत करें/ जो स्वयं उद्योग करता है, इंद्र उसी की सहायता करते हैं/ हम सदा प्रसन्नचित रहते हुए उदीयमान सूर्य को देखें।

आर्य भावुक और प्रकृति-पूजक थे। उनके प्रधान देवता अग्नि, इंद्र, वरुण, पूषण, सोम, उषा, थे। आर्य और अनार्य सभ्यता के प्रादुर्भाव का स्पष्ट प्रमाण आर्यों के उस दृष्टिकोण से प्राप्त होता है जो उन्होंने अनार्यों के लिंगम और उस ईश्वर के प्रति, जिसका वह प्रतीक है, अपनाया। इस विषय में ऋग्वेद में (७,२१,५) एक महत्वपूर्ण उल्लेख मिलता है। जिसका देवता लिंग है वे हमारे पुण्यस्थल में प्रविष्ट न होने पावें। बाद में इस लिंग उपासना के प्रति आर्यों का जो भय था वह जाता रहा। शादी-विवाह के द्वारा यहाँ के लोगों के साथ संबंध बढ़ा तब शिव भी आर्यों के देवता हो गए। बाद में तो अनार्यों के देवता शिव, पशुपति अधिक महत्वशाली स्थान प्राप्त कर लेते हैं और बी०एन०लूनिया ने तो भारतीय सभ्यता तथा संस्कृति का विकास में लिखा कि यजुर्वेदके युग में से तो शिव बड़े महान देवता का रूप प्राप्त कर लेते हैं। जालौन के प्राचीन इतिहास की यही रुपरेखा मिलती है। बहुत निश्चयात्मक रूप कुछ नही कहा जा सकता है। आगे बढने से पहले जालौन के नामकरण के बारे में चर्चा करते हैं, फिर आगे चलें।

जालौन के नामकरण के संबंध में एक सामान्य विश्वास यह है कि इसका नाम जालिम नाम के एक ब्राह्मण के साथ जुड़ा है जिसने इसको बसाया। एक मान्यता यह भी है कि किसी जालिम सिंह कछवाहा द्वारा यह स्थान बसाया गया उसी के नाम पर यह स्थान बिगड़ के जालवन फिर जालौन हुआ। जालौन के इतिहास के बारे में निश्चयात्मक रूप से कुछ कहना बड़ा मुश्किल है, लेकिन एक बात जो निश्चित रूप से कही जा सकती है वह यह है कि यह स्थान पुरातन काल से ही मुनियों, संतों द्वारा पोषित होता रहा है। तो आइये इस दृष्टिकोण से भी नामकरण को देखें और सोचें।

शंकराचार्य ने वेद और वेदांत के प्रचार-प्रसार के लिए सभी संन्यासियों को संगठित करके उन्हें दस वर्गों में विभाजित किया था, जिन्हें गिरि, पूरी, सरस्वती, अरण्य, तीर्थ, आश्रम, पर्वत, भारती तथा सागर आदि नामों से जाना जाता है। इसी संप्रदाय की एक सखा वनभी थी। जिसकी एक पीठ लगभग एक हजार वर्ष पूर्व जालौन के उत्तरी छोर में यमुना नदी के किनारे पर थी। यह स्थान अब जालौन खुर्द कहलाता है। इसी वन शाखा की गद्दी पर पीठाधीश्वर जाल नामक ऋषि थे। उनके नाम जाल में वन जोड़ने से जालवनबनता है। उनका आश्रम यहाँ होने के कारण यह स्थान जालवन कहलाने लगा। बाद में यह पीठ पंचनदा में कंजौसा चली गई। कंजौसा के सभी महंतों के नाम के साथ अभी भी वन जुड़ा रहता है। १८७४ के जालौन के दरबारियों की जो सूची मैंने कुछ दिनों पहले पोस्ट की थी उसमे भी क्रम संख्या ३८ पर कंजौसा के महंत जगदीस वन का नाम देखा जा सकता है। इससे इस वन सखा का महत्व का पता चलता है। तो जाल ऋषि के नाम पर अगर यह स्थान जालवन हो गया तो क्या कोई आश्चर्य की बात तो नहीं है। लोग यह भी सवाल कर सकते हैं कि जालवन से यह जालौनकैसे हो गया? तो इस पर मेरा कहना यह है कि यह उर्दू भाषा के कारण हुआ क्योंकि उर्दू में जालवनको जालौनभी पढ़ा जा सकता है। उच्चारण अशुद्ध होने लगा। एक बात और आपको बता दूँ, पुराने बहुत से दस्तावेजों में इसका नाम जालवन भी मिलता है। अपने यहाँ के भूतपूर्व विधायक गरीबदास जी के अनुसार सन १९३२ के रामलीला विज्ञापन के पर्चों में जालौनको जालवनही लिखा जाता था।


तो जालौन के नामकरण की चर्चा के बाद आज यहीं तक। 
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© देवेन्द्र सिंह  (लेखक)

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इतिहास की तंग गलियों में जनपद जालौन - 1

देवेन्द्र सिंह जी - लेखक 
अभी तक आपसे १८५७-५८ की क्रांति को ही साझा कर रहा था। यह क्रम तो चलता ही रहेगा। आज सोचा अपने जनपद के पुराने इतिहास को भी जैसा माने पढ़ा, जाना और फिर लिखा भी आप सब से साझा करूं। इसी क्रम में यह श्रंखला शुरू कर रहा हूँ, इस उम्मीद के साथ कि इसको भी आप पसंद करेंगे और अपनी राय देंगे।

जनपद का इतिहास उस युग के विवरण से प्रारंभ होना चाहिए जब मानव द्वारा इस जनपद में पदार्पण कर इसकी भूमि में बसा हो, परन्तु यथार्थ इतिहास उन सत्य घटनाओं का विवेचन करता है जो किसी न किसी प्रमाण पर आधारित हों। कुछ वर्षों पूर्व तक जनपद की प्राचीनता के बारे में ज्यादा पता नही था। मगर कालपी के यमुना के पुल के पास पुरातत्व विभाग द्वारा खुदाई करने पर हाथी दांत, फासिल्स तथा अन्य औजार मिलने पर तथा उनकी कार्बन डेटिंग करने पर पता चला कि ये सब ४०००० से ४५००० हजार वर्ष पुराने हैं अर्थात मध्य पाषाण युग यहाँ आदम जाति का निवास था। (आर तिवारी, पी सी पन्त और आई बी सिंह –Middle Paleolithic human activity and Palaeoclimate at Kalpi in Ymuna valley, Ganga plain Man and Environent .xxvii no.2(1-13) Pune)

आज यह विवादास्पद माना जा रहा है की आर्य बाहर से आए या भारतवासी थे और यहीं से बाहर गए। अधिकांश विद्वानों की राय रही है कि ये भारत के मूल निवासी नहीं थे, लेकिन अनेक भारतीय इतिहासकारों ने भारत को ही आर्यों का मूल स्थान माना है। भारतीय इतिहास कांग्रेस के ग्वालियर अधिवेशन (१९५२) में डा० राधा कुमुद मुकर्जी ने कहा था कि आदिमानव पंजाब और शिवालिक की भूमि में विकसित हुआ होगा। पंजाब में मनुष्य का जन्म, फिर सिंध की तराई में कृषि-सभ्यता का विकास, और सिन्धु के पठार में भारत की प्राचीन सभ्यता का अवशेष पाया जाना ये सारी बातें आपस में एक दुसरे की पुष्टि करती हैं। डा० गंगा नाथ झा, डा० अविनास दास, डा० राजबली पाण्डेय आदि का भी कहना है संपूर्ण भारतीय साहित्य में एक भी ऐसा संकेत नही मिलता जिससे सिद्ध किया जा सके कि भारतीय आर्य कहीं बाहर से आए। भारतीय अनुश्रुति या जनश्रुति में भी कहीं भी इस बात की गंध नही मिलती कि आर्यों की मात्रुभूमि या धर्मभूमि इस देश से कहीं बाहर थी। रामधारी सिंह दिनकर ने तो अपनी पुस्तक भारतीय संस्कृति के चार अध्याय में तो यह तक कह दिया कि अगर आर्य मध्य एशिया से आए तो उन्होंने वेद के समान कोई प्रामाणिक साहित्य अपने मूल स्थान में क्यों नहीं छोड़ा। इन सब विद्वानों के अनुसार आर्यों का मूल स्थान पंजाब ही रहा होगा और इसी भाग को उन्होंने ब्रह्माव्रत, मध्य देश और आर्यावर्त का नाम दिया।

प्राचीन काल में जालौन का परिक्षेत्र जिस भू-भाग में सम्मिलित था उसे विभिन्न समय में विभिन्न नामों से जाना जाता रहा है, जैसे चेदि देश, दर्शाण, जुझौती, जेजाक भुक्ति आदि। इसका नामकरण कभी शासकों कभी यहाँ के निवासियों के नाम पर पड़ता रहा। इस भू-भाग को अब बुंदेलखंड के नाम से पुकारते हैं।

पूर्व पाषाण युग और उत्तर पाषाण युग के बाद धातु युग आया। उत्तर भारत विशेष रूप से उत्तर प्रदेश में तांबे की वस्तुओं के अवशेष प्राप्त हुए। कुछ वर्षों पूर्व उत्तर प्रदेश की पुरातत्व विभाग की इकाई ने कालपी में खुदाई करके कॉपर आन्त्थ्रोमार्क कालीन सभ्यता का पता लगाया (कृष्ण कुमार- ए यूनीक कॉपर आन्थ्रोमार्क फ्राम कालपी, जनरल आफ द गंगानाथ झा केन्द्रीय संस्क्रत विद्यापीठ) तथा कुछ वर्ष पूर्व उरई के मातापुरा मुहल्ले में मकान की नीव की खुदाई में एक तांबे का पिंड, कुछ कुल्हाड़ियाँ और एक गोल आकार की चीज मिली। मातापुरा की गिनती उरई के प्राचीनतम इलाके में की जाती है। यह मुहल्ला नगर से निकलने वाले गोहनी नाले के दक्षिणी किनारे पर बसा है। मोहल्ले का नाम यहाँ पर स्थित बड़ी माता के मन्दिर पर पड़ा है। जिस स्थान से यह सामग्री मिली है वह मन्दिर के पास ही है। जो भी वस्तुएं मिली हैं उनके अवलोकन से पता चलता है कि ये एक ही बड़े पिंड से काट कर निर्मित की गई हैं। इन सब उपकरणों के बारे में डा० कृष्ण कुमार का कहना है कि सीधी कुल्हाडियों का निर्माण एक पीस से किया गया है, जो पेड़ों को काटने के काम में आती रही होगी। बर्छियां और हार्फून अलग अलग सांचे में ढाल कर बनाए गए हैं। उनके अनुसार उरई से प्राप्त सामग्री २०००० बी०सी० से १३०० बी०सी० के काल की हैं। उन्होंने अपने शोध आलेख में लिखा है This hoard comprising finished and unfinished artifacts together with four copper ingots clearly show that during the protohistoric time a workshop was located at Matapura in Orai. Copper hoards represent the late Rigvedic Aryan culture. इससे यह कहा जा सकता है कि वैदिक काल या उसके अंत तक आर्य लोग यहाँ (जालौन) के उर्वरा मैदान में फैल चुके थे।


आर्य कदाचित गत्वर (घुमक्कड़) लोग थे। यह कल्पना की जा सकती है कि आर्यों का कोई दल यमुना नदी का किनारा पकड़ कर इस तरफ (जालौन जनपद) आ गया। यहाँ का मनमोहक लैंडस्केप, पास ही बड़ी नदी और सुंदर जंगल, चारागाह जो उनके जीवन-यापन के लिए बहुत उपयोगी था को पाकर यहीं पर रुक कर बस गया। यहाँ की उर्वरा धरती ने उनके घुमक्कड़ स्वभाव को बदल दिया। यही वह भू-भाग है जिसको बाद में जालौन के नाम से जाना गया। बुंदेलखंड में आर्य सबसे पहले जालौन के क्षेत्र में बसे थे। दीवान प्रतिपाल सिंह ने अपनी पुस्तक बुंदेलखंड का इतिहास में इस भाग को बुंदेलखंड का स्वीटजरलैंड कहते हुए लिखा कि आर्य सबसे पहले यहीं पर बसे। आज यहीं तक अगली पोस्ट में देखेंगे की आर्य जब यहाँ आये तो उन्होंने यहाँ क्या देखा और पाया। 
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© देवेन्द्र सिंह  (लेखक)

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02/12/2017

अजेय और गौरवशाली योद्धा कालिंजर दुर्ग

बुन्देलखण्ड के विंध्याचल पर्वत पर अपराजेय योद्धा के रूप में खड़ा कालिंजर दुर्ग सदियों बाद भी अपनी वैभवगाथा, अपनी गौरवगाथा का वर्णन स्वयं करता है। देश के विशाल और अपराजेय माने जाने वाले दुर्ग को सतयुग में कीर्तिनगर, त्रेता में मध्यगढ़, द्वापर में सिंहलगढ़ और कलियुग में कालिंजर के नाम से जाना जाता रहा। यह दुर्ग उत्तर प्रदेश के बुन्देलखण्ड भूभाग में बाँदा जिले की नरैनी तहसील में स्थित है। लगभग 800 फीट ऊपर स्थित दुर्ग के सर्पाकार मार्ग पर चढ़ते हुए दाँयी ओर विंध्याचल पर्वत दुर्ग की विशालता का आभास करवाता है तो बाँये हाथ पर गहरी खाई और दूर-दूर तक फैले खेत मन मोहते हैं। विंध्याचल पर्वत शृंखला पर लगभग 3.2 वर्ग किमी क्षेत्रफल में स्थित दुर्ग का पौराणिक महत्त्व भी है। कालिंजर को कालंजर का अपभ्रंश कहा जाता है। भगवान शिव को कालंजर के नाम से जाना जाता है, जिसका अर्थ है मृत्यु को नष्ट करने वाला। एक पौराणिक कथा के अनुसार भगवान शंकर ने समुद्र मंथन पश्चात निकले विश को पीने के बाद उसे अपने कंठ से नीचे नहीं उतरने दिया था। उन्होंने अपनी व्याकुलता को शांत करने के लिए इसी पर्वत पर आकर विष जीर्ण किया था। इसी कारण से इस स्थान को कालिंजर के नाम से पुकारा जाने लगा। इसके अतिरिक्त महाकाव्यों, पुराणों और अन्य प्राचीन संस्कृत ग्रन्थों में कालिंजर को शैव साधना का एक महत्तवपूर्ण केन्द्र स्वीकारा गया है। भागवत पुराण में भी ब्रह्मा ने सृष्टि की रचना हेतु कालिंजर में ही तपस्या के द्वारा भगवान विष्णु को संतुष्ट किया था।


कालिंजर की इस पौराणिकता की भाँति इसकी ऐतिहासिकता भी विशेष है। जिस पर्वत पर दुर्ग स्थित है उसके दक्षिण-पष्चिम में बाघेन नदी प्रवाहित होती है जो आगे जाकर यमुना नदी में मिल जाती है। प्राचीनकाल में इस दुर्ग पर जैजाकभुक्ति (जयशक्ति चन्देल) का साम्राज्य था। जैजाकभुक्ति बुन्देलखण्ड का ही एक प्राचीन नाम है। इस दुर्ग पर 9वीं शताब्दी से लेकर 15वीं शताब्दी तक चन्देल शासकों का राज्य रहा है। कालिंजर दुर्ग पर चन्देल षासकों के अलावा चेदि, नन्द, मौर्य, शुंग, कुषाण, गुप्त आदि राजवंशों का शासन करना भी माना जाता है। वैसे कालिंजर में पुरापाषाणकालीन मानवीय सक्रियता के साक्ष्य मिलते हैं। दुर्ग से अथवा उसके आसपास के क्षेत्र से, पर्वत शृंखला से पुरापाषाणकालीन अनेक उपकरण प्राप्त हुए हैं। उपलब्ध ऐतिहासिक साहित्य एवं दस्तावेज के अनुसार कालिंजर दुर्ग पर सर्वप्रथम चेदि शासकों के अधिकार करने का उल्लेख ऋग्वेद की एक दान स्तुति में चैद्य वसु द्वारा ब्रह्यतिथि नामक ऋषि को ऊँटों और गायों के दान किये जाने से मिलता है। इसके साथ-साथ कालिंजर दुर्ग से गुप्तकालीन अभिलेखों के मिलने से यहाँ गुप्त शासकों के सक्रिय रहने का भी प्रमाण मिलता है। इसी तरह कलचुरि वंश के प्रथम शासक कृष्णराज की मुद्राओं से यहाँ कलचुरि शासकों के होने के प्रमाण भी मिले हैं। इसी वंश के दूसरे शासक विज्जल द्वारा कालिंजर पुरवराधीष्वर उपाधि धारण करने ने इस तथ्य को और भी प्रामाणिकता प्रदान की। कलचुरियों के शासन के पश्चात यहाँ पर गुर्जरों-प्रतिहारों का शासन आया। इनके बाद कुछ समय के लिए राष्ट्रकूटों का आधिपत्य रहा और इसके पश्चात चन्देलों का शासन स्थापित हुआ। कालिंजर दुर्ग पर भले ही विभिन्न राजवंशों का शासन रहा हो किन्तु उसको व्यापक प्रसिद्धि चन्देल शासकों के आने के पश्चात प्राप्त हुई। इसका एक प्रमुख कारण उनका लम्बे समय तक यहाँ राज्य करना रहा है। चन्देल शासकों ने यहाँ 9वीं शताब्दी से लेकर 15वीं शताब्दी तक शासन किया। गुर्जर-प्रतिहारों के शासन करने का प्रमाण भोज प्रथम (836-8500) के वाराह ताम्रपत्र से तथा राष्ट्रकूटों के शासन करने का उल्लेख कृष्ण तृतीय के जूरा अभिलेख से मिलता है।

चन्देल शासन में दुर्ग पर महमूद गजनवी, कुतुबुद्दीन ऐबक, शेरशाह सूरी और हुमायूँ ने आक्रमण किए लेकिन जीतने में असफल रहे। उपलब्ध दस्तावेजों और अभिलेखों के अनुसार इस दुर्ग पर सन् 10230 में चन्देल राजा विद्याधर के शासन में महमूद गजनबी ने आक्रमण किया था। दुर्ग की अपनी अभेद्य सुरक्षा व्यवस्था और पर्याप्त घेरेबन्दी के कारण यह आक्रमण असफल रहा। कालान्तर में सन् 12020 में परमर्दिदेव के शासनकाल में कुतुबुद्दीन ऐबक ने दुर्ग पर हमला किया किन्तु वह भी असफल रहा। सन् 15450 में इस दुर्ग पर शेरशाह सूरी ने आक्रमण किया। वह महीनों इस दुर्ग पर अपना कब्जा करने के लिए परेशान रहा। एक दिन वह स्वयं ही तोप से गोला दागने को आगे आया। दुर्ग की सुरक्षा प्राचीर को लेकर ऐसी धारणा है कि इसकी दीवार पर तोप के गोलों का कोई असर नहीं होता था। कहा तो ये भी जाता है कि तोप के गोले दुर्ग की प्राचीर से टकराकर वापस लौट जाते थे। इसका प्रमाण शेरशाह सूरी के हमले के समय देखने को मिलता है जबकि उसके द्वारा चलाया गया एक गोला दुर्ग की दीवार से टकराकर वापस उसके बारूद के ढेर पर आकर गिरा और फट गया। परिणामस्वरूप शेरशाह सूरी गम्भीर रूप से घायल हो गया और उसकी मृत्यु हो गई। ऐसा माना जाता है कि चन्देल शासनकाल के अन्तिम चरण में सन् 15590 में कालिंजर दुर्ग पर अकबर ने विजय प्राप्त की। किंवदंतियों के अनुसार तत्कालीन चन्देल राजा रामचन्द्र इस किले को स्वयं ही छोड़कर चले गये थे और अकबर ने उस खाली पड़े दुर्ग पर बिना किसी सशस्त्र संघर्ष के अथवा बिना किसी तरह का युद्ध किये कब्जा कर लिया था। दुर्ग को अकबर ने अपने नवरत्नों में से एक बीरबल को उपहारस्वरूप जागीर के रूप में दे दिया। बीरबल के बाद इस दुर्ग पर मुगलों का आधिपत्य बना रहा। इस दुर्ग पर बुन्देलों ने औरंगजेब के काल में हमला करके विजय प्राप्त की और मान्धाता चौबे को कालिंजर का दुर्गपति नियुक्त किया। सन् 18120 में ब्रिटिश कर्नल मार्टिन्डेल ने चौबे परिवार को सदा के लिए दुर्ग से बेदखल करके अपने अधिकार में ले लिया। ऐसा करने के बाद अंग्रेजी शासकों ने कालिंजर को बाँदा जनपद में सम्मिलित किया और दुर्ग को सैनिक छावनी में बदल दिया। इससे पूर्व यह दुर्ग बुंदेल राजा छत्रसाल के अधीन रहा और छत्रसाल के बाद किले पर पन्ना के हरदेवशाह ने अपना अधिकार जमाया था। 

कालिंजर दुर्ग में प्रवेश सात द्वारों से होता है। इसका प्रथम द्वार सिंह द्वार के नाम से पुकारा जाता है। दूसरा गणेश द्वार तथा तीसरा द्वार चंडी द्वार कहलाता है। बुद्धगढ़ द्वार अर्थात् स्वर्गारोहण द्वार चौथा द्वार है जिसके पास भैरवकुंड नामक सुंदर जलाशय है। दुर्ग का पाचवाँ द्वार अत्यंत कलात्मक है जिसे हनुमान द्वार कहा जाता है। छठवें द्वार के रूप में लाल द्वार और सातवाँ एवं अंतिम द्वार नेमि द्वार है, इसे महादेव द्वार भी कहा जाता है। दुर्ग में पहुँचने के लिए वर्तमान में उत्तर दिशा के रास्ते को मुख्य मार्ग के रूप में प्रयोग में लाया जा रहा है। इसी मार्ग में उक्त सातों द्वार अपना परिचय स्वयं करवाते हैं। लाल बलुआ प्रस्तरखण्डों से निर्मित दुर्ग का सम्पूर्ण वास्तु अपने आपमें अद्वितीय एवं कलात्मक है। सुरक्षा की दृष्टि से सर्वोत्तम माने जाने वाले इस दुर्ग को अकारण ही अजेय दुर्ग का गौरव प्राप्त नहीं है। इसकी सुरक्षा प्राचीर की परिधि लगभग 6 किमी की है। इसकी ऊँचाई 5 मी0 से 12 मी0 तक है और इसी चैड़ाई 4 मी0 से 8 मी0 तक है। 


कालिंजर दुर्ग की सुरक्षा व्यवस्था जितनी अभेद्य है उसकी स्थापत्य कला उतनी ही बेजोड़ है। दुर्ग की महत्वपूर्ण स्थापत्य कलाओं, संरचनाओं में दुर्ग की सुरक्षा प्राचीर, नीलकंठ मंदिर, चौबे महल, रानी महल, राजा अमान सिंह महल, मृगधारा, वेंकट बिहारी मंदिर, पातालगंगा, भैरवकुंड, पांडुकुंड, सिद्ध की गुफ़ा, राम कटोरा, चरण पादुका, सुरसरि गंगा, बलखंडेश्वर, भड़चाचर आदि दर्शनीय स्थलों के साथ-साथ अनेकानेक छोटे-बड़े जलाशय शामिल हैं। कालिंजर के अधिष्ठाता देवता नीलकंठ महादेव हैं। यह दुर्ग का प्राचीन मंदिर है, जो यहाँ का मुख्य आकर्षण है। इसे चंदेल शासक परमादित्य देव ने बनवाया था। यह दुर्ग के पश्चिम कोने में स्थित है। मंदिर में अठारह भुजा वाली विशालकाय प्रतिमा के अलावा नीले रंग का स्वयंभू शिवलिंग स्थापित है। शिवलिंग की विषेशता यह है कि उससे निरन्तर पानी रिसता रहता है। मंदिर के रास्ते पर भगवान शिव, गणेश और हनुमान की प्रतिमाएँ हैं जिन्हें पर्वत काट कर बनाया गया है। नीलकंठ मंदिर का मंडप चंदेल वास्तुशिल्प की अनुपम कृति है। मंदिर के प्रवेशद्वार पर चंदेल शासक परिमाद्रदेव रचित शिवस्तुति है। मंदिर के ऊपर पर्वत को काटकर दो जलकुंड बनाए गए हैं। जिन्हें स्वर्गारोहण कुंड कहते हैं। इसके नीचे पर्वत को काटकर बनाई गई कालभैरव की प्रतिमा है। किले के परिसर में फैली मूर्तियाँ पर्यटकों और दर्शकों के आकर्षण का केन्द्र हैं। कालभैरव की प्रतिमा सर्वाधिक भव्य है। 32 फीट ऊँची और 17 फीट चैड़ी इस प्रतिमा के 18 हाथ हैं। वक्ष में नरमुंड और त्रिनेत्र धारण किए यह प्रतिमा बेहद जीवंत है। 


नीलकंठ मंदिर के अतिरिक्त भी दुर्ग में सातवें द्वार से प्रवेश करते ही चौबे महल स्थित है। भग्नावशेष के रूप में स्थित इस महल का प्रवेशद्वार एकदम सादा किन्तु आकर्षक स्थापत्य कला का प्रतीक है। दोमंजिला इस महल को चौबे बेनी हजूरी तथा खेमराज ने बनवाया था। इसके आगे के मार्ग पर वेंकट बिहारी मंदिर और रानी महल स्थित हैं। वेंकट बिहारी मंदिर बुन्देलकालीन है और दुर्ग के लगभग मध्य भाग में स्थित है। इस मंदिर में गर्भगृह, आयताकार मंडप, छत पर आकर्षक शिखर तथा छोटी-छोटी स्तम्भयुक्त छतरियाँ स्थित हैं। रानी महल भी दोमंजिला विशाल भवन है। भग्नावशेष होने के बाद भी इसका विशाल प्रवेशद्वार और भीतरी खुला बरामदा सम्मोहित करता है। महल में सीता सेज नामक एक छोटी गुफा है जहाँ एक पत्थर का पलंग और तकिया रखा हुआ है जो किसी समय एकांतवास के रूप में उपयोग में लाई जाती थी। 


दुर्ग में कई छोटे-बड़े जलाशय बने हुए हैं। उनमें से एक जलकुंड सीताकुंड कहलाता है। इसी क्षेत्र में दो संयुक्त तालाब हैं। इसका पानी चर्म रोगों के लिए लाभकारी माना जाता है। कहा जाता है कि इस तालाब में स्नान करने से कुष्ठरोग दूर हो जाते हैं। क्षेत्र में किंवदंती है कि चंदेल शासक कीर्तिवर्मन का कुष्ट रोग यहाँ स्नान करने से दूर हुआ था। दुर्ग में एक अन्य जलाशय भी है जिसे पातालगंगा नाम से जाना जाता है। इसमें जलप्रवाह निरन्तर बना रहता है। इसके साथ ही औषधीय गुणों से युक्त जल यहाँ के पांडु कुंड में चट्टानों से निरंतर टपकता रहता है। दुर्ग के दक्षिण मध्य की ओर मृगधारा है। यहाँ पर्वत को तराश कर दो कमरों का निर्माण किया गया है। एक में सात मृगों की मूर्तियाँ हैं जिनसे बराबर जल बहता रहता है। इस स्थान को पुराणों में वर्णित सप्त ऋषियों की कथा से सम्बद्ध माना गया है।

वर्तमान में कालिंजर दुर्ग प्ररातत्त्व विभाग की देखरेख में है। विभाग के द्वारा दुर्ग के भीतर यहाँ की बिखरी, क्षतिग्रस्त मूर्तियों को दुर्ग में ही एक संग्रहालय के रूप में सुरक्षित कर रखा है। ये मूर्तियाँ शिल्प कला की दृष्टि से महत्त्वपूर्ण हैं। यह संग्रहालय बुन्देल शासक अमानसिंह द्वारा दुर्ग के कोटि तीर्थ तालाब के तट पर अपने रहने के लिए बनवाये महल में बना हुआ है। यह महल बुंदेली स्थापत्य का अनुपम उदाहरण है। 



कालिंजर को कालजयी अकस्मात ही नहीं कहा जाता है। इसने कालखंड के प्रत्येक प्रसंग को चाहे वो प्रागैतिहासिक काल से सम्बद्ध हों, पौराणिक घटनाएँ हों, अनेक विदेशी आक्रांताओं के हमले हों या फिर सन् 1857 का विद्रोह सबको बड़ी खूबसूरती से अपने आँचल में समेट रखा है। वैदिक ग्रन्थों के आधार पर जहाँ इसे विश्व का प्राचीनतम किला माना गया है, वहीं इसके विस्तार और विन्यास को देखते हुए आधुनिक एलेक्जेंड्रिया से भी श्रेष्ठ घोषित किया गया है। इसके बाद भी कालिंजर दुर्ग अभी भी पर्यटन नक़्शे पर उस प्राथमिकता में शामिल नहीं है, जैसा कि उसे होना चाहिए। इसका मुख्य कारण कालिंजर और उसके आसपास के क्षेत्र में पर्यटन सम्बन्धी सुविधाओं का अभाव होना है। अब जबकि दुर्ग पुरातत्त्व विभाग की देखरेख में है; राज्य सरकार की ओर से इसको पर्यटन की दृष्टि से विकसित करने सम्बन्धी प्रयासों को आरम्भ करने की बात कही जा चुकी है तब आशा की जा सकती है कि निकट भविष्य में कालिंजर का अजेय और गौरवशाली दुर्ग देश के पर्यटन नक़्शे पर भी अपनी आभा तथा गौरवगाथा बिखेरेगा।

16/10/2017

बौद्धिक ज्ञान प्रतियोगिता - 2017 का अंतिम परिणाम

डॉ० दिनेश चन्द्र द्विवेदी, पूर्व विभागाध्यक्ष, हिन्दी, गाँधी महाविद्यालय, उरई की स्मृति में आयोजित 
बौद्धिक ज्ञान प्रतियोगिता - 2017 का अंतिम परिणाम  


04/09/2017

जालौन जनपद और आजाद हिन्द फ़ौज

देवेन्द्र सिंह - लेखक 
जनपद जालौन में रह रहे आजाद हिन्द फ़ौज के कुछ सैनिकों के बारे में जो कुछ मालुम हो सका था वह आपसे साझा कर रहा हूँ. वैसे यह मेरा विषय नहीं है क्योंकि मैंने अपने शोध को १८५७-५८ की क्रान्ति तक ही रखा है. इसके बाद मेरे मित्र डा राजेन्द्र पुरवार का आग्रह हुआ कि १८५७ के बाद के जालौन के इतिहास के बारे में लिखो. मैंने हाथ खड़े कर दिए कि आगे का वह लिखें और मै साथ-साथ रहूँगा. तब उन्होंने बुंदेलखंड की राजनैतिक प्रयोगशाला - जनपद जालौन शीर्षक से एक पुस्तक लिखी. इस पुस्तक में जिले में रह रहे आजाद हिन्द फ़ौज के लोगों के बारे में खोजबीन करके उनका इंटरव्यू लेकर जानकारी प्राप्त करके एक अध्याय राजेन्द्र जी ने लिखा था. इंटरव्यू में मै भी साथ रहता था. अब जो मालूम हुआ वह आपके सामने रख रहा हूँ.
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आजाद हिन्द फ़ौज में इस जिले के उरई के दिग्विजय सिंह यादव, कोटरा के छोटे खां, दौलतपुरा के नजर अली, कुरसेंड़ा के रघुवीर सिंह व टीहर के फतेह बहादुर के नाम मिलते हैं. जब हम लोगों ने इंटरव्यू लिया उस समय दिग्विजय सिंह अजनारी रोड पर रह रहे थे. काफी बुढ्ढे हो गए थे और अस्वस्थ भी थे, इस कारण उनका इंटरव्यू कई बार में पूरा हुआ. दिग्विजय सिंह उरई के डी.ए.वी. से आठवी पास करने के बाद १९३९ में अंग्रेजी सेना में झाँसी में भर्ती हुए. ४ मार्च को मेडिकल कोर में सेवा हेतु चयनित हो कर कलकत्ता से सिंगापुर पहुंचे. वे लगभग ६ वर्ष वहाँ रहे और दो बार आत्म-समर्पण के साक्षी बने थे. उनकी याददाश्त बड़ी अच्छी थी और जो उन्होंने बतलाया उसका सार इस प्रकार है.

जापनी हवाई हमले से ध्वस्त उनके शिविर के हजारों भारतीय सैनिकों ने १५-२-१९४२ को जापान के कर्नल हिकाई के समक्ष आत्मसमर्पण किया था. पहले रास बिहारी बोस और एन.एस.गिल के कहने से आजाद हिन्द फ़ौज में शामिल हो युद्ध में रहे. बाद में १९४३ की जुलाई में नेताजी द्वारा आजाद हिन्द फ़ौज की दूसरी बार विधिवत स्थापना की गई. उनके आह्वान पर जालौन जिले के अन्य पांच साथियों के साथ नेहरु और गाँधी ब्रिगेड में शामिल होकर मलाया और सिंगापुर के युद्ध में भाग लिया. क्वालालाम्पुर में एक बार फिर १५-८-१९४५ को जापानी आत्मसमर्पण व नेताजी की तथाकथित दुर्घटना के बाद अंग्रेज सेना के समक्ष समर्पण किया. बाद में गढवाल राइफल के संरक्षण में लखनऊ लाया गया. यादवजी ने बतलाया कि यहाँ पर हुलकारे कूकुर की भांति मुकदमा चलाया गया. अब यह हुल्कारे कूकुर वाली बात समझ में नहीं आई. तब उन्होंने जो बताया उससे उनके मन की पीड़ा समझ में आई. उन्होंने कहा कि सड़क का जो कुत्ता (कूकुर) होता है उसको कोई नहीं पूछता है. वह जहाँ भी जाता है उसको दुत्कारा जाता है. हुलकारे जाने का अर्थ दुत्कारने से बुंदेलखंड में लिया जाता है. यही हाल हम लोगों का था क्योंकि अभी हम अंग्रेजो के गुलाम थे और उनकी फ़ौज के विरुद्ध लडे थे हमारी इज्जत वो क्यों करते.

यादव जी ने और भी कई बाते साझा कीं.  उनके अनुसार फ़ौज का उदेश्य वाक्य एकता, विश्वास व बलिदान  तथा प्रतीक चिन्ह छलांग लगाता चीताथा. फ़ौज का युद्धघोष नारा दिल्ली चलोजय हिन्द था.  फ़ौज का प्रयाण गीत कदम कदम बढाए जा, ख़ुशी के गीत आए जा था, जिसे कर्नल राम सिंह ने संगीतबद्ध किया था. उन्होंने बताया कि अंततोगत्वा २४ जनवरी १८४६ को मुक्त घोषणा के बाद उरई वापस आए. जहाँ उनका वीर योद्धा की भांति स्वागत गाँव और नगर में किया गया. आजाद हिन्द फ़ौज के इस जनपदीय सेनानी दिग्विजय सिंह ने २००६ में अंतिम साँस ली.

अपने जीवनकाल की सांध्य बेला डिकौली में बिता रहे मलखान सिंह ने भी अपनी यादें साझा करते हुए बतलाया कि वे भी मेडिकल यूनिट में सिपाही न० ९२६०४८ के रूप में भर्ती हुए थे. कानपुर, अहमदाबाद और बम्बई में प्रशिक्षण प्राप्त कर दक्षिण पूर्वी एशिया के कई देशों में रहे. इनको भी अंग्रेजी सेना की पराजय के बाद जापनी सेना को सौप दिया गया था. बाद में नेता जी ने आई.एन.ए.में शामिल कर लिया. बाद की कहानी वही है जो दिग्विजय सिंह की थी. मलखान सिंह का दुःख यह है कि आजाद होने के बाद शासन की उपेक्षा के चलते उन्हें शीघ्र ही बिसार दिया गया.


नेता जी द्वारा नेहरु, गाँधी, आजाद के नाम पर ब्रिगेड को बनाना क्या आपको कुछ सोचने के लिए विवश नहीं करता? यदि करता है तो धन्यवाद. जिले में आजाद हिन्द फ़ौज की इतनी ही जानकारी ही मेरे पास है. यदि किसी का नाम या कोई जानकारी छूट गई हो तो मैं पहले से ही माफ़ी मांगे लेता हूँ.  

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© देवेन्द्र सिंह  (लेखक)

कॉपीराईट चेतावनी - बिना देवेन्द्र सिंह जी की अनुमति के किसी भी लेख का आंशिक अथवा पुर्णतः प्रकाशन कॉपीराइट का उल्लंघन माना जायेगा. ऐसा करने वाले के विरुद्ध कानूनी कार्यवाही की जा सकती है. जिसके लिए वह व्यक्ति स्वयं जिम्मेवार होगा.

20/08/2017

बाँदा के नवाब अलीबहादुर और अजयगढ़ राज - भाग २


देवेन्द्र सिंह - लेखक 


आरा (बिहार) की पलटन के बाँदा आने और उनका सहयोग मिलने से बाँदा के नवाब को बड़ी राहत महसूस हुई। अब उसको अजयगढ़ वालों से इतना डर नही रहा जितना पहले था। बिहार से ही एक और सैन्य दल इस ओर चला था। इन सैनिकों ने नागौद में क्रांतिकारियों की मदद करके वहां क्रांति करवा दी थी। यह सैन्य दल भी बाँदा आ गया। नवाब ने इनकी भी बड़ी आवभगत की। इनका नायक सूबेदार शिव दयाल था। कुछ समय बाद ही बाबु कुँवरसिंह भी रीवा के रस्ते बाँदा आ गए। रीवा राज ने इनको अपने यहाँ नही रुकने दिया था। इन सब सैन्य दलों के बाँदा आने के पहले अजयगढ़ के रणजोर दौऊआ ने बाँदा के एक साहूकार के लडके का अपहरण करवा लिया था और अपने कैद में रखे था। नवाब के बार-बार अनुरोध करने पर भी उसने लडके को मुक्त नही किया वह फिरौती की रकम मांग रहा था। नवाब अपने सैन्य दल के बूते दउआ से लड़कर उसको मुक्त करने की हिम्मत नही कर पा रहा था और फिरौती की रकम देकर छुडवाने में नवाब की भारी बेज्जती होती। अब नवाब को एक मौका मिला। उसने सूबेदार शिव दयाल से रणजोर पर आक्रमण करने में सहायता देने को कहा। सूबेदार शिव दयाल ने दउआ पर आक्रमण करने का भय दिखाया इस पर दउआ ने साहूकार के पुत्र को छोड़ दिया। लेकिन रनजोर सिंह दउआ के तो बुरे दिन शुरू हो गए थे।

९ अक्तूबर १८५७ को दउआ की जंगपुर चौकी के कुछ सिपाहियों की बाँदा में रुके सैनिकों से कहासुनी हो गई और अजयगढ़ के सिपाहियों ने इन सैनिकों पर गोलीबारी कर दी। बाँदा के सैनिकों को इस तरह की किसी बात की उम्मीद नही थी। अचानक हुई इस गोलीबारी की घटना में बाँदा के १५-१६ सैनिक मारे गए। बाँदा के सैनिकों ने इसका बदला लेने के लिए दउआ पर आक्रमण कर दिया। कुंअरसिंह ने भी इस युद्ध में भाग लिया मगर उन्होंने सेना का नेतृत्व अलीबहादुर को करने दिया। दो दिन चली इस लड़ाई में अंत में दउआ की पराजय हुई। दउआ ने सफ़ेद झंडा फहरा कर हार स्वीकार की और अजयगढ़ जाने के लिए मार्ग देने की बात कही। अलीबहादुर तो दउआ से बहुत ही नाराज था अतः उसने मांग नही मानी। लड़ाई चलती रही। चौथे दिन के युद्ध में सूबेदार भवानी सिंह और महताब अली ने दउआ को पकड़ ही लिया। उसके साथ अजयगढ़ के तीन अन्य सैनिक अधिकारी भी पकड़े गये। इन सबको कैद करके बाँदा लाया गया और नवाब अलीबहादुर के सामने पेश किया गया। कहा तो यह जाता है की अजयगढ़ के इन लोगों के सिर काट कर खटोआ दीवाल पर लटका दिया गया था। इस लड़ाई में बहुत से क्रन्तिकारी सैनिक तथा लगभग ३०० सिपाही मारे गए थे।


इस युद्ध में नवाब द्वरा भर्ती किए गए सैनिकों, बाँदा में रुके हुए अंग्रेजी फ़ौज के विद्रोही सैनिकों और आरा तथा दानापुर बिहार से आए सनिकों ने भाग लिया था। रणजोर दउआ को जब नवाब के सामने पेश किया गया तो बाँदा के विद्रोही सैनिकों ने नवाब से दउआ के बदले में तीन लाख रु० की मांग की। अलीबहादुर ने इसमें असमर्थता जताई। इस पर इन सैनिकों ने गौरिहार के जागीरदार से कहा कि वे दउआ को ले लें और बदले में इनाम के तौर पर दो लाख रु० दें। इस पर गौरिहार के जमिदाए ने कहा कि वे नवाब अलीबहादुर को पकड़ लावें और अंग्रेजों के हवाले कर दें तो वह उनको पांच लाख रु० देंगे। इस पर ये सैनिक बहुत नाराज हो गए और उन्होंने मौका देख कर एक दिन गौरिहार जमीदार का बाँदा स्थित महल को लुट लिया। महल की बहुमूल्य वस्तुए,रुपए, कीमती फर्नीचर आदि जला डाला। दउआ को नवाब को सौंप दिया। अब उन्होंने नवाब से कहा कि वे चालीस हजार रु० ही दे दें। नवाब जब चालीस हजार पर भी तैयार नही हुए तो उन्होंने कहा कि दउआ को उनको लौटा दिया जाय और जो दो तोपे निम्नीपार की लड़ाई में अजयगढ़ वालो की छिनी गईं है वे भी उनको दीं जाय यदि यह बात नही मानी जाती है तो वे नवाब के महल और बाँदा को लुट लेंगे। मगर नवाब को कुँवरसिंह और उनकी फ़ौज का सहारा था अतः उसने एक भी बात नही मानी। बात कुछ और बढती इसके पहले ही नवाब ने बवाल की जड़ को ही काट देना ठीक समझा। अलीबहादुर के इशारे पर उनके समर्थक इमामबख्श ने दउआ को फांसी पर चढ़ा कर इस किससे को ही खत्म कर दिया। रणजोर दउआ का आतंक समाप्त होने पर नवाब ने चैन की साँस ली। फौजियों ने दोनों तोपें अपने अधिकार में ले लीं। 

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© देवेन्द्र सिंह  (लेखक)

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09/08/2017

शौर्य बलिदान की गाथा कहता लोकपर्व कजली

बुन्देलखण्ड क्षेत्र में आज भी भुन्जरियों का पावन पर्व कजली पूरे उत्साह और श्रद्धा से मनाया जाता है. विन्ध्य पर्वत श्रेणियों में बसा, सुरम्य सरोवरों से रचा, नैसर्गिक सुन्दरता से निखरा बुन्देलखण्ड क्षेत्र सदैव से अपनी ऐतिहासिकता, संस्कृति, लोक-तत्त्व, शौर्य-ओज, आन-बान-शान की अद्भुत छटा के लिए प्रसिद्द रहा है. यहाँ की लोक-परम्परा में शौर्य-त्याग-समर्पण-वीरता के प्रतीक मने जाने वाले कजली का विशेष महत्त्व है. इस क्षेत्र के परम वीर भाइयों, आल्हा-ऊदल के शौर्य-पराक्रम के साथ-साथ अन्य बुन्देली रण-बाँकुरों की विजय-स्मृतियों को अपने आपमें संजोये हुए कजली मेले का आयोजन आठ सौ से अधिक वर्षों से निरंतर होता आ रहा है. किसी समय में बुन्देलखण्ड में कजली को खेती-किसानी से सम्बद्ध करके देखा जाता था. ग्रीष्म की लू-लपट से अपने आपको झुलसा देने वाली गरमी से गर्म-तप्त खेतों को जब सावन की फुहारों से ठंडक मिलती थी तो यहाँ का किसान अपने आपको खेती के लिए तैयार करने लगता था. सावन महीने की नौवीं से ही इसका अनुष्ठान शुरू हो जाता था. घर-परिवार की महिलाएँ खेतों से मिट्टी लाकर उसे छौले के दोने (पत्तों का बना पात्र) में भरकर उसमें गेंहू, जौ आदि को बो देती थी. नित्य उसमें पानी-दूध को चढ़ाकर उसका पूजन किया जाता था, इसके पीछे उन्नत कृषि, उन्नत उपज होने की कामना छिपी रहती थी. सावन की पूर्णिमा को इन पात्रों (दोने) में बोये गए बीजों के नन्हें अंकुरण (कजली) को निकालकर दोनों को तालाब में विसर्जन किया जाता था. बाद में इन्हीं कजलियों का आपस में आदरपूर्वक आदान-प्रदान करके एक दूसरे को शुभकामनायें देते हुए उन्नत उपज की कामना भी की जाती थी. ये परम्परा आज भी चली आ रही है, बस इसमें शौर्य-गाथा के जुड़ जाने से आज इसका विशेष महत्त्व हो गया है.

बुन्देलखण्ड के महोबा राज्य पर पृथ्वीराज चौहान की नजर बहुत पहले से लगी हुई थी. महोबा राज्य के विरुद्ध साजिश रचकर कुछ साजिशकर्ताओं ने वहां के अद्भुत वीर भाइयों, आल्हा-ऊदल को महोबा राज्य से निकलवा दिया था. पृथ्वीराज चौहान को भली-भांति ज्ञात था कि महोबा के पराक्रमी आल्हा और ऊदल की कमी में महोबा को जीतना जीतना आसान होगा. महोबा के राजा परमाल की पुत्री चंद्रावलि अपनी हजारों सहेलियों और महोबा की अन्य दूसरी महिलाओं के साथ प्रतिवर्ष कीरत सागर तालाब में कजलियों का विसर्जन करने जाया करती थी. सन 1182 में दिल्ली के राजा पृथ्वीराज चौहान ने राजकुमारी के अपहरण की योजना बनाई और तय किया गया कि कजलियों के विसर्जन के समय ही आक्रमण करके राजकुमारी का अपहरण कर लिया जाये. अपनी विजय को सुनिश्चित करने और राजकुमारी के अपहरण के लिए उसके सेनापति चामुंडा राय और पृथ्वीराज चौहान के पुत्र सूरज सिंह ने महोबा को घेर लिया. जिस समय ये घेरेबंदी हुई उस समय आल्हा-ऊदल कन्नौज में थे.

महोबा राजा सहित सबको इसका एहसास था कि बिना आल्हा-ऊदल पृथ्वीराज चौहान की सेना को हरा पाना मुश्किल होगा. राजा परमाल खुद ही आल्हा-ऊदल को राज्य छोड़ने का आदेश दे चुके थे, ऐसे में उनके लिए कुछ कहने-सुनने की स्थिति थी ही नहीं. ऐसे विषम समय में महोबा की रानी मल्हना ने आल्हा-ऊदल को महोबा की रक्षा करने के लिए तुरंत वापस आने का सन्देश भिजवाया. सूचना मिलते ही आल्हा-ऊदल अपने चचेरे भाई मलखान के साथ महोबा पहुँच गए. परमाल के पुत्र रंजीत के नेतृत्व में पृथ्वीराज की सेना पर आक्रमण कर दिया गया. इस युद्ध की सूचना मिलते ही राजकुमारी चंद्रावलि का ममेरा भाई अभई (रानी मल्हना के भाई माहिल का पुत्र) उरई से अपने बहादुर साथियों के साथ महोबा पहुँच गया.

लगभग 24 घंटे चले इस भीषण युद्ध में आल्हा-ऊदल के अद्भुत पराक्रम, वीर अभई के शौर्य के चलते पृथ्वीराज चौहान की सेना को पराजय का मुंह देखना पड़ा. सेना रणभूमि से भाग गई. इस युद्ध में पृथ्वीराज चौहान का पुत्र सूरज सिंह भी मारा गया. इसके अलावा राजा परमाल का पुत्र रंजीत सिंह और वीर अभई भी वीरगति को प्राप्त हुए. ऐसी किंवदंती है कि वीर अभई सिर कटने के बाद भी कई घंटों युद्ध लड़ता रहा था. कहा जाता है कि इसी युद्ध में पृथ्वीराज चौहान ने ऊदल की हत्या छलपूर्वक कर दी थी. जिसके बाद आल्हा ने पृथ्वीराज चौहान को मारने की शपथ ली किन्तु बाद में अपने गुरु की आज्ञा मानकर संन्यास ग्रहण कर जंगल में तपस्या के लिए चले गए थे.


ऐतिहासिक विजय को प्राप्त करने के बाद राजकुमारी चंद्रावलि और उसकी सहेलियों के साथ-साथ राजा परमाल की पत्नी रानी मल्हना ने, महोबा की अन्य महिलाओं ने भी भुजरियों (कजली) का विसर्जन किया. इसी के बाद पूरे महोबा में रक्षाबंधन का पर्व धूमधाम से मनाया गया. तब से ऐसी परम्परा चली आ रही है कि बुन्देलखण्ड में रक्षाबंधन का पर्व भुजरियों का विसर्जन करने के बाद ही मनाया जाता है. वीर बुंदेलों के शौर्य को याद रखने के लिए ही कहीं-कहीं सात दिनों तक कजली का मेला आयोजित किया जाता है. यहाँ के लोग आल्हा-ऊदल के शौर्य-पराक्रम को नमन करते हुए बुन्देलखण्ड के वीर रण-बाँकुरों को याद करते हैं. 

09/07/2017

१८५७-५८ की क्रांति में बाँदा के नवाब अलीबहादुर का दुश्मन अजयगढ़ राज

देवेन्द्र सिंह (लेखक)
इधर तो नवाब अलीबहादुर धन की तंगी से जूझ रहे थे ऊपर से अजयगढ़ राज नाक में दम किये था। यह अजयगढ़ राज कहाँ था और उसकी सीमायें क्या थी, इसके बारे में थोडी सी बातें साझा करके आगे चलें तो ठीक रहेगा। १९०७ में प्रकाशित ईस्टर्न स्टेट गजेटियर भाग vi में अजयगढ़ के बारे में लिखा गया है
The Ajaigarh state was composed of two tracts, one surrounding the chief town, the other lying to the south of it near maihar. The former tract, which had an area of about 258squre miles, was situated between 24.45’ and 25.2’N., and 80.4’ and 80.32E., the southern tract with an area of 513 between 24.4 and 24.45N., and 79.56’ and 80.38’E., giving a total area of 771 square miles. Chief town of state situated at the foot of the old fort in 24.54’N., and 80.18’E.While the matter was under reference to the Court of Directors, the Mutiny broke out. During the Mutiny the Rani sent two guns, 200 matchlock men and some cavalry to assist Mr. Chester, collector of Banda. The Ajigarh troops made themselves very useful in feeding the chaukis of the town, and their presence(especially of the guns) served to keep our Native Infantry detachment in awe and did good service in restoring confidence to the town people.

बाँदा जिला तथा अजयगढ़ राज पूर्व में महाराजा छत्रसाल के राज के भाग थे, बाद में बाँदा वाला भाग पूना के पेशवा के कहने से वर्तमान नवाब अलीबहादुर के पूर्वज अलीबहादुर प्रथम ने जीत कर नवाब का ख़िताब प्राप्त करके बाँदा को अपनी राजधानी बनाया। छत्रसाल के वंशज बाँदा को वापस लेने या पाने के लिए हमेशा लालायित रहते थे। राजा विजय सिंह के निधन के बाद चूँकि कोई उतराधिकारी नहीं था अतः अंग्रेजों ने राजा कौन बने मामले को कुछ समय के लिए पेंडिंग में डाल दिया था। रणजोर दौउआ और रानी दोनों ही राज पर अधिकार चाहते थे। इसी समय १८५७ की क्रांति हो गई। इस समय रानी ही राज अस्थायी तौर से चला रही थी। अजयगढ़ राज ने जब बाँदा में अशांति और बवाल देखा तो इसका फायदा उठाने के लिए रणजोर दाउआ को सेना सहित बाँदा को हस्तगत करने के लिए भेजा। बाँदा से लगी हुई निम्नी नदी दोनों की सीमा थी। नदी के उस तरफ अजयगढ़ का किला है। रणजोर अजयगढ़ के किला में आकर जम गया और वहाँ से बाँदा के इलाके में घुसपैठ करने लगा। इसी क्रम में एक दिन रणजोर ने नवाब के कुछ गांवों पर कब्जा कर लिया। ये गाँव शुरू से ही विवादित थे। रणजोर इन गांवों से आधा राजस्व माँगता था मगर नवाब पांच आना ही देने को तैयार था।

रणजोर बहुत ही चालक था उसने बाँदा के अन्य लोगों से संपर्क करना शुरू किया जिनका झुकाव नवाब की तरफ नहीं था। बाँदा जिले में इंसाउल्ला नाम का एक बड़ा मालगुजार था और उसका झुकाव अंग्रेजों की तरफ था। रणजोर ने उस पर डोरे डालना शुरू किया। अलीबहादुर को जब यह बात पता चली तो वह बड़ा परेशान हुआ। नवाब ने अपने सलाहकारों की मदद से इंसाउल्ला को अपनी खुद की खड़ी की गई फ़ौज का सेनापति नियुक्त किया। अगर वह ऐसा न करता तो इंसाउल्ला रणजोर से मिल जाता और नवाब को शिकस्त देने में कोई कसर न छोड़ता।

निम्नी पार नदी पर अजयगढ़ राज की तरफ से एक सेना नायक और बीस सिपाही तैनात थे। अजयगढ़ की रानी ने दो परवानों के साथ मुसाहिब जान को भेजा। रानी ने नवाब को लिखा था कि दोनों में लड़ाई नहीं होनी चाहिए, अतः वह अपनी फ़ौज निम्नीपार के मोर्चे से हटा ले। नवाब ने इस पत्र के मिलने के बाद अपने सिपाहियों को वहां से हटा कर आदेश किया कि अब वहाँ पर केवल ४-६ सिपाही ही रहें ताकि अजयगढ़ राज के ज्यादा आदमी बाँदा की तरफ न आने पावें और अगर कुछ लोग आना चाहें तो उनको रोका-टोका न जाय लेकिन वे बिना हथियार के ही इस तरफ आएं। रणजोर ने इस आदेश को मानने से इनकार कर दिया और कहा कि जब रानी खुद उसको आदेश देंगी तभी वह इस कागज के आदेश को मानेगा। दौउआ के इस रूप से नवाब इतना सहम गया कि उसने आदेश कर दिए कि मोहर्रम के ताजिए अबकी बार निम्नीपार जलमग्न करने के लिए न ले जाएँ।  

इधर यह सब हो रहा था तभी एक और सूचना ने नवाब के होश उड़ा दिए। उनके गुप्तचरों ने सूचित किया कि आरा (बिहार) की कुछ फ़ौज बाँदा में नवाब के इलाके के बिलगांव गाँव में आकर डेरा डाल चुकी है और उनकी नीयत क्या है इस बारे में कुछ भी कहा नहीं जा सकता है। बिलगांव में एक बाजार सा लग गया था, ये सैनिक बाजार से ही सब राशन आदि खरीदते थे। नवाब ने अंग्रजों की देशी फ़ौज जो बाँदा में अभी भी रुकी हुई थी, के सूबेदार भवानी सिंह से कहा कि वे आरा की रेजिमेंट की नीयत के बारे में पता करें। सूबेदार भवानी सिंह अपनी कंपनी के सैनिकों के साथ गया और आरा के सैनिकों से मुलाकात करके उनके मिशन के बारे में पता किया। सब प्रकार से संतुष्ट होकर भवानी सिंह पूरी रेजिमेंट को लेकर बाँदा आया और उनके नायकों से नवाब की मुलाकात कराई। नवाब ने इन सबका बड़ा मान किया। इन सब सैनिकों ने नवाब को बतलाया कि वे सब धर्म की रक्षा के लिए दिल्ली जा रहे हैं। निम्नीपार में रणजोर दौउआ अभी भी अपनी फ़ौज के साथ पड़ा था।


तभी नवाब के दिमाग में एक विचार कौंधा। वह क्या था इस बारे में अब अगली पोस्ट में... 

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© देवेन्द्र सिंह  (लेखक)


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08/07/2017

बाँदा नवाब अलीबहादुर और 1857 की क्रांति

लेखक - देवेन्द्र सिंह 
बाँदा में क्रांति होने पर नवाब अलीबहादुर का शासन तो स्थापित हो गया मगर क्रांति के लिए धन की आपूर्ति कैसे हो यह एक गंभीर मुद्दा था। इसके साथ ही अजयगढ़ राज्य जो अंग्रेजों का सहायक था की तरफ से भी मुसीबतें खड़ी की जा रहीं थी। इन दोनों से अलीबहादुर कैसे निबटे आज उसी पर कुछ चर्चा, लेकिन पहले धन की आपूर्ति के बारे में।

सबसे पहले नवाब ने अपने कुछ सैनिक मौदहा भेज कर वहाँ की तहसील को लुटवा लिया। हमीरपुर से वैसे भी सब अंग्रेज अधिकारी भाग गए थे, अतः मौदहा के तहसीलदार ख्वाजाबक्स ने भी क्रांतिकारियों का विरोध करना ठीक नही समझा बल्कि वह खुद उनके साथ मिल गया। मौदहा की तहसील से पन्द्रह हजार रुपए ही मिले इतने से तो कुछ होना हवाना नहीं था। विद्रोही सैनिकों की मांग थी कि नवाब हर सैनिक को १६ रुपए महीने और हर सवार सैनिक को २५ रुपए महीने के हिसाब से चार दिन के अन्दर वेतन दें। नवाब को हथियार और गोलाबारूद भी खरीदना था। अब वह क्या करे, इसी उधेड़बुन में वह था तभी उसके करिन्दा खुमान ने उसको सलाह दी की तिरौहाँ(कर्वी) के मराठा जागीरदार नारायणराव और माधवराव से आर्थिक मदद लेने का प्रयास किया जाय। अलीबहादुर को भी आशा की किरण दिखलाई पड़ी अतः उसने खुमान को ही इस काम के लिए तिरौहाँ भेजा। तिरौहाँ वालों को जब १५जून,१८५७ को बाँदा में कर्वी के ज्वाइंट मजिस्ट्रेट कोकरेल के मारे जाने की सुचना मिला थी तभी से वे भी कर्वी के क्षेत्र में अपना अधिकार करने को लालायित थे। उन्होंने नवाब को आर्थिक मदद देने की इच्छा नवाब के करिन्दा खुमान से जाहिर की। खुमान से सूचना मिलते ही नवाब नारायणराव और माधवराव से मिलने के लिए १५ नवम्बर को तिरौहाँ के लिए चला। 

अलीबहादुर को जिले में एक मजबूत साथी की जरूरत थी जो उसकी हर प्रकार से मदद कर सकता हो। वह जानता था कि नारायणराव और माधवराव उसके साथ तभी शामिल होंगे जब उनको विश्वास होगा कि मैंने अंग्रेजों को जिले से भगा दिया है और वे उस पर विश्वास कर सकते हैं। अतः उसने अपना रुतबा दिखाने के लिए अपने साथ दो हजार सैनिक लिए। पांचवी इररेगुलर पलटन के दस्ते उसके बाडीगार्ड के रूप में उसके साथ चल रहे थे। तिरौहाँ में नवाब का भव्य स्वागत हुआ। तिरौहाँ के जागीरदार का मुख्य सलाहकार राधा गोविन्द बहुत चालक और होशियार व्यक्ति था। उसने रुपए देने के साथ साथ कुछ शर्तें नवाब के सामने रखीं। शर्त यह थी कि पहले इलाके का निर्धारण हो जाय कि कौन से इलाके किसके पास रहेंगे जहाँ से वे रेवन्यू की उगाही करेंगे। इस शर्त को मानने के अलावा नवाब के पास कोई अन्य चारा ही नही था। मानना मजबूरी थी अतः तय हुआ कि परगना छीबू, दर्सेंडा, बदौसा तथा बबेरू का आधा इलाका नारायणराव और माधवराव के अधिकार में रहेगा तथा परगना पेलानी, सिमौनी, बाँदा, और आधा बबेरू नवाब के पास रहेंगे। इसके बाद नवाब दो लाख की रकम लेकर बाँदा लौटे। सैनिकों की तनखाह बाटने के बाद धन की कमी फिर भी रही।

सैनिकों ने एक दूसरा रास्ता धन प्राप्त करने का निकला। उन्होंने बाँदा के महाजनों से संपति गिरवी रख कर रुपया देने को कहा। इस पर महाजन तैयार हो गये। सैनिकों ने नवाब से गहने व जवाहरात आदि लिए और महाजनों के पास रख दिए, लेकिन एक गडबडी हो गई। सैनिकों ने देखा कि बाँदा के महाजनों के पास बहुत रुपया है तो उन्होंने रुपया तो लिया ही रेहन वाले जवाहरात आदि भी नहीं दिए।
नवाब ने चरखारी के राजा रतनसिंह से भी आर्थिक मदद का अनुरोध किया मगर रतन सिंह ने साफ मना कर दिया क्योंकि वह तो अंग्रेजों का सहायक था नवाब के कर्मचारियों ने हर व्यापरी से चार सौ से पांच सौ रुपए वसूल किए जिससे सैनिकों का वेतन दिया जा सके। नवाब के कर्मचारी तो बाँदा के हर आदमी की माली हालत को जानते थे ही २नवम्बर को मीरन साहब और मिर्जा विलायत हुसेन ने शहर के व्यापारी रतीराम की मकान की नींव को खुदवा डाला। इस खुदाई से उन्हें दो हीरे, सोना, चाँदी, और लगभग ७५००० रुपये नगद मिले। इसमें से ३५००० रुपए रसद आदि खरीदने में ही समाप्त हो गए।

अंग्रेजों के समय के बहुत से नौकर जैसे फरहतअली तहसीलदार बाँदा, चिरंजीलाल तहसीलदार स्योढ़ा, बाँदा के कोतवाल फजल मोहम्मद आदि सब ने नवाब की सेवा में आना स्वीकार कर लिया था इनको नवाब से १०० रु० हर महीने वेतन मिलता था। इन सबको जिले के एक एक आदमी की हैसियत मालुम थी। इनके बतलाने पर नवाब ने शिवचरन का हाथी अपने यहाँ मंगवा लिया(कन्सल्टेशन न०२०५ दिनांक, २९-१-१८५८ दुर्गा प्रसाद का बयान, राष्ट्रीय अभिलेखागार, नई दिल्ली) । जमुना प्रसाद की दस हजार रुपए मूल्य की संपति भी नवाब ने कब्जे में ले ली। इतना ही नही नवाब ने बाँदा के मुन्स्फी के वकील बाबु बिहारीलाल को धन न देने कारण कैद में डलवा दिया। कुछ दिनों बाद दो हजार रुपए दे कर वे मुक्त हुए। इस घटना से वे इतने घबरा गए कि बाँदा ही छोड़ कर चले गए। इसके बाद भी धन की कमी बनी ही रहती थी। 

धन प्राप्त करने के लिए नवाब को हर हथकंडे अपनाने पड़ रहे थे। बाँदा के कोतवाल का भतीजा नवाब की तथा क्रांतिकारियों की गतिविधियों की सुचना अंग्रेज अधिकारीयों को पहुँचा देता था। नवाब ने पता चलने पर उसको पकडवा लिया और भारी दंड वसूल किया। नवाब ने एक और तरीका धन प्राप्त करने का निकला। अंग्रेजों के समय के कीरत पुरवार, काशी, नन्हे, और मदन दलाल आदि कर्मचारियों ने नवाब की नौकरी स्वीकार नहीं की थी, नवाब उनसे बहुत नाराज था अतः बाँदा में उनके घर जला दिए गए और उनकी करीब साढ़े चार लाख रुपए की संपति जब्त कर ली। नवाब ने कभी बाँदा के कश्मीरी सेठ जमुना दस के पास चाँदी का हाथी का हौदा और चाँदी की एक घडी रेहन रख कर रुपया लिया था उसको जमुनादास से जबरजस्ती वापस ले लिया। आर्थिक तंगी अभी भी थी अतः नवाब ने एक बार फिर अपने जवाहरात गिरवी रख कर बीस हजार रुपए और एक बार चालीस हजार रुपए प्राप्त किए और क्रांति को जारी रखा। 

इस प्रकार हम देखते हैं कि क्रांति को जारी रखने के लिए नवाब के पास धन की बहुत कमी थी उसने इसके लिए हर प्रकार के हथकंडे अपनाएं। तो क्या इन कार्यों के लिए नवाब को दोष दिया जा सकता है? मेरा मानना है कि यह सब उसको मजबूरी में करना पड़ा था। उसने इस धन में से एक भी पैसा अपने ऐशोआराम के लिए खर्च नहीं किया था। बल्कि जब भी आवश्यकता पड़ी उसने अपने निजी जेवरात को रेहन रखने में जरा भी सोच विचार नही किया और गिरवी रखा।


यह मेरी अपनी सोच है। आप भी सोचिए। जरूरी नहीं कि मेरी और आपकी सोच एक समान ही हो। 

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© देवेन्द्र सिंह  (लेखक)

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