20/08/2017

बाँदा के नवाब अलीबहादुर और अजयगढ़ राज - भाग २


देवेन्द्र सिंह - लेखक 


आरा (बिहार) की पलटन के बाँदा आने और उनका सहयोग मिलने से बाँदा के नवाब को बड़ी राहत महसूस हुई। अब उसको अजयगढ़ वालों से इतना डर नही रहा जितना पहले था। बिहार से ही एक और सैन्य दल इस ओर चला था। इन सैनिकों ने नागौद में क्रांतिकारियों की मदद करके वहां क्रांति करवा दी थी। यह सैन्य दल भी बाँदा आ गया। नवाब ने इनकी भी बड़ी आवभगत की। इनका नायक सूबेदार शिव दयाल था। कुछ समय बाद ही बाबु कुँवरसिंह भी रीवा के रस्ते बाँदा आ गए। रीवा राज ने इनको अपने यहाँ नही रुकने दिया था। इन सब सैन्य दलों के बाँदा आने के पहले अजयगढ़ के रणजोर दौऊआ ने बाँदा के एक साहूकार के लडके का अपहरण करवा लिया था और अपने कैद में रखे था। नवाब के बार-बार अनुरोध करने पर भी उसने लडके को मुक्त नही किया वह फिरौती की रकम मांग रहा था। नवाब अपने सैन्य दल के बूते दउआ से लड़कर उसको मुक्त करने की हिम्मत नही कर पा रहा था और फिरौती की रकम देकर छुडवाने में नवाब की भारी बेज्जती होती। अब नवाब को एक मौका मिला। उसने सूबेदार शिव दयाल से रणजोर पर आक्रमण करने में सहायता देने को कहा। सूबेदार शिव दयाल ने दउआ पर आक्रमण करने का भय दिखाया इस पर दउआ ने साहूकार के पुत्र को छोड़ दिया। लेकिन रनजोर सिंह दउआ के तो बुरे दिन शुरू हो गए थे।

९ अक्तूबर १८५७ को दउआ की जंगपुर चौकी के कुछ सिपाहियों की बाँदा में रुके सैनिकों से कहासुनी हो गई और अजयगढ़ के सिपाहियों ने इन सैनिकों पर गोलीबारी कर दी। बाँदा के सैनिकों को इस तरह की किसी बात की उम्मीद नही थी। अचानक हुई इस गोलीबारी की घटना में बाँदा के १५-१६ सैनिक मारे गए। बाँदा के सैनिकों ने इसका बदला लेने के लिए दउआ पर आक्रमण कर दिया। कुंअरसिंह ने भी इस युद्ध में भाग लिया मगर उन्होंने सेना का नेतृत्व अलीबहादुर को करने दिया। दो दिन चली इस लड़ाई में अंत में दउआ की पराजय हुई। दउआ ने सफ़ेद झंडा फहरा कर हार स्वीकार की और अजयगढ़ जाने के लिए मार्ग देने की बात कही। अलीबहादुर तो दउआ से बहुत ही नाराज था अतः उसने मांग नही मानी। लड़ाई चलती रही। चौथे दिन के युद्ध में सूबेदार भवानी सिंह और महताब अली ने दउआ को पकड़ ही लिया। उसके साथ अजयगढ़ के तीन अन्य सैनिक अधिकारी भी पकड़े गये। इन सबको कैद करके बाँदा लाया गया और नवाब अलीबहादुर के सामने पेश किया गया। कहा तो यह जाता है की अजयगढ़ के इन लोगों के सिर काट कर खटोआ दीवाल पर लटका दिया गया था। इस लड़ाई में बहुत से क्रन्तिकारी सैनिक तथा लगभग ३०० सिपाही मारे गए थे।


इस युद्ध में नवाब द्वरा भर्ती किए गए सैनिकों, बाँदा में रुके हुए अंग्रेजी फ़ौज के विद्रोही सैनिकों और आरा तथा दानापुर बिहार से आए सनिकों ने भाग लिया था। रणजोर दउआ को जब नवाब के सामने पेश किया गया तो बाँदा के विद्रोही सैनिकों ने नवाब से दउआ के बदले में तीन लाख रु० की मांग की। अलीबहादुर ने इसमें असमर्थता जताई। इस पर इन सैनिकों ने गौरिहार के जागीरदार से कहा कि वे दउआ को ले लें और बदले में इनाम के तौर पर दो लाख रु० दें। इस पर गौरिहार के जमिदाए ने कहा कि वे नवाब अलीबहादुर को पकड़ लावें और अंग्रेजों के हवाले कर दें तो वह उनको पांच लाख रु० देंगे। इस पर ये सैनिक बहुत नाराज हो गए और उन्होंने मौका देख कर एक दिन गौरिहार जमीदार का बाँदा स्थित महल को लुट लिया। महल की बहुमूल्य वस्तुए,रुपए, कीमती फर्नीचर आदि जला डाला। दउआ को नवाब को सौंप दिया। अब उन्होंने नवाब से कहा कि वे चालीस हजार रु० ही दे दें। नवाब जब चालीस हजार पर भी तैयार नही हुए तो उन्होंने कहा कि दउआ को उनको लौटा दिया जाय और जो दो तोपे निम्नीपार की लड़ाई में अजयगढ़ वालो की छिनी गईं है वे भी उनको दीं जाय यदि यह बात नही मानी जाती है तो वे नवाब के महल और बाँदा को लुट लेंगे। मगर नवाब को कुँवरसिंह और उनकी फ़ौज का सहारा था अतः उसने एक भी बात नही मानी। बात कुछ और बढती इसके पहले ही नवाब ने बवाल की जड़ को ही काट देना ठीक समझा। अलीबहादुर के इशारे पर उनके समर्थक इमामबख्श ने दउआ को फांसी पर चढ़ा कर इस किससे को ही खत्म कर दिया। रणजोर दउआ का आतंक समाप्त होने पर नवाब ने चैन की साँस ली। फौजियों ने दोनों तोपें अपने अधिकार में ले लीं। 

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© देवेन्द्र सिंह  (लेखक)

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